.. अपने समय का सूर्य हूं मैं

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सुनूं क्या सिन्धु! मैं गर्जन तुम्हारा/ स्वयं युगधर्म का हुंकार हूं मैं! या, ‘मर्त्य मानव की विजय का तूर्य हूं मैं/ उर्वशी अपने समय का सूर्य हूं मैं।

युगधर्म का हुंकार भरने वाली ये पंक्तियां राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने लिखी हैं। ऐसी ही न जाने दिनकर की लिखी कितनी पंक्तियाँ आज आम लोगों के बीच कहावत बन चुकी है।

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर का जन्म 23 सितंबर 1908 को बिहार के बेगुसराय जिले के सिमरिया नामक स्थान पर हुआ। कौन जानता था कि सिमरिया घाट की बालू की रेत पर खेलने वाला बालक एक दिन अपनी तर्जनी उठाकर कह सकेगा- लोहे के पेड़ हरे होंगे तू गान प्रेम का गाता चल, नम होगी यह मिट्टी जरूर, आंसू के कण बरसाता चल।

सिमरिया घाट बिहार के मौजूदा बेगूसराय जिले में है और उसकी बालू की रेत पर खेलने वाला बालक था रामधारी सिंह दिनकर। यह दिनकर की कल्पनाशीलता है कि वह प्रेम के बल पर लोहे के पेड़ के हरे होने की बात करते हैं। यह दिनकर का आत्मविश्वास है कि वह खुद को अपने समय का सूर्य घोषित करते हैं- मत्र्य मानव की विजय का तूर्य हूं मैं, उर्वशी! अपने समय का सूर्य हूं मैं।

दिनकर की रचनाओं की व्यपकता का आलम यह है कि वह गांधी से लेकर माक्र्स तक, आर्य से लेकर अनार्य तक, हिंदू संस्कृति के आविर्भाव से लेकर प्राचीन हिंदुत्व और इस्लाम से लेकर भारतीय संस्कृति और यूरोप के संबंधों तक को परखते हुए विपुल लेखन करते हैं।

गांधी और माक्र्स को लेकर दिनकर में एक खास तरह का द्वंद्व देखने को मिलता है। हिंसा व अहिंसा के बीच का उनका द्वंद्व उनकी रचनाओं में भी दिखाई देता है। जब चीन ने भारत पर आक्रमण किया था, तब दिनकर जी ने परशुराम की प्रतीक्षा लिखी, जिसमें उन्होंने अपने तर्कों के आधार पर हिंसा और अहिंसा के इस्तेमाल के दर्शन को साफ किया।

दिनकर ने स्वीकार भी किया है कि ‘मैं जीवन भर गांधी और माक्र्स के बीच झटके खाता रहा हूं। इसलिए उजले को लाल से गुणा करने पर जो रंग बनता है, वही रंग मेरी कविता का रंग है।’ लेकिन साहित्य पर दिनकर बेहद साफगोई से कहते हैं, ‘साहित्य के क्षेत्र में हम न तो किसी गोयबेल्स की सत्ता मानने को तैयार हैं, जो हमसे नाजीवाद के समर्थन में लिखवाए और न किसी स्टालिन की, जो हमें साम्यवाद से तटस्थ रहकर फूलने-फलने नहीं दे सकता।

हमारे लिए फरमान न तो क्रेमलिन से आ सकता है, और न आनंद भवन से। अपने क्षेत्र में तो हम सिर्फ उन्हीं नियंत्रणों को स्वीकार करेंगे, जिन्हें साहित्य की कला अनंत काल से मानती चली आ रही है।’

नामवर सिंह ने दिनकर के बारे में कहा था कि दिनकर भारत के सच्चे लोकतंत्र के चिंतक थे। उनकी लिखी किताब संस्कृति के चार अध्याय’ भारत की सामासिक संस्कृति का ग्रंथ है न कि हिंदू संस्कृति का।

उन्होंने आगे कहा कि दिनकर के साहित्य का मूल्यांकन आसान नहीं है। उनकी कविता का पाट काफी फैला हुआ है जिसे किसी एक कोटि में नहीं रखा जा सकता। एक तरफ़ कुरुक्षेत्र जैसे काव्य में जहां वे युद्ध और शांति जैसे विचारों से जूझते दिखते हैं और लिखते हैं-:

जब तक मनुज मनुज का यह सुख भाग नहीं सम होगा/ शमित न होगा कोलाहल संघर्ष नहीं कम होगा.

वहीं वे उर्वशी जैसे प्रबंध काव्य में काम और प्रेम के शाश्वत सवालों से रूबरू होते दिखाई देते हैं और ‘उर्वशी’ के मनोभावों को व्यक्त करते हुए लिखते हैं, ‘तन से मुझको कसे हुए अपने दृढ़ आलिंगन में, मन से किंतु, विषण्ण दूर तुम कहां चले जाते हो?’

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर का भागलपुर से भी गहरा नाता रहा था। एक साल के लिए वे तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति रहे और आखिर में राज्यसभा के सदस्य भी बने। 1964 से 1965 के बीच वे कुलपति थे। उनकी जयंती पर शुक्रवार को हिंदी विभाग ने अपने पूर्व कुलपति एवं राष्ट्रकवि को याद किया। उनकी कविताओं की भी चर्चा हुई।

वहीं पटना के दिनकर चौक पर राष्ट्रतकवि रामधारी सिंह दिनकर के जयंती समारोह पूरे राजकीय सम्मान के साथ मनाई गई। इस जयंती समारोह में डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव एवं डीएम संजय अग्रवाल ने दिनकर चौक स्थित दिनकर की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर उन्हें याद किया।

इस कार्यक्रम के बाद पत्रकारों से बात करते हुए तेजस्वी यादव ने केंद्र द्वारा चलाई जा रही स्वच्छता अभियान पर कहा कि प्रधानमंत्री द्वारा चलाई गई यह योजना बिल्कुल फेल है। सुशिल मोदी के बयान पर कहा कि सुशिल मोदी को हमलोग गंभीरता से नहीं लेते है उन्हें फोटो खिंचवाने का शौक है इसलिए ऐसा बयान देते रहते है।