आम का फसल बर्बाद होने से किसान ने की आत्महत्या

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भोजपुर- सरकार जहां एक तरफ किसानों के लिए तरह-तरह की योजनाएं की बात करते थकते नहीं वहीं आज किसान एक तरफ प्रकृति की मार झेल रहे हैं, और एक तरफ सरकार की मार झेल रहे हैं आत्महत्या करने को विवश होने लगे हैं बिहार में किसान आत्महत्या की घटनाएं कम होने का मतलब यह बिलकुल भी नहीं है कि यहां के किसान खेती कर मालामाल हो रहे हैं. कृषि संकट के मामले में बिहार की तस्वीर भी दूसरे राज्यों की तरह भयावह होती जा रही है.

बिहार के भोजपुर ज़िले के कृष्णगढ थाना क्षेत्र के मिल्की गाँव के रहने वाले पैर में गहरे जख्म से परेशान वृद्ध रामाधार बीन के 45 वर्षीय बेटे दशरथ बीन ने आम का फसल बर्बाद हो जाने के कारण अपने आम के बगीचे में ही एक पेड़ से लटककर ख़ुदकुशी कर लिया. आत्महत्या करने वाले किसान के पिता ने खुद बताया कि दशरथ बिन ने मिल्की गाँव के ही रहने वाले भुनेश्वर सिंह से 2 लाख रुपये पर आम का बगीचा लिया था. घर में पैसे न होने के कारण मेरा बेटा हजारो रुपये कर्ज लेकर जमीन मालिक को दिया था मगर अचानक से हुई ओलावृष्टि से आम के फसल पर इतना बुरा असर पड़ा कि फसल बुरी तरह बर्बाद हो गया जिससे वह हफ्ते दिनों से बहुत परेशान रहा करता था. ओले से हुई तबाही से मेरा बेटा काफी तनाव में था.

क़र्ज़ बहुत बढ़ गया था, खेती की लागत भी बहुत बढ़ गई थी. कितने मेहनत के बाद तो आम के पेड़ों पर फल आने शुरू हुए ही थे कि ओले पड़ गए जिससे सारे फसल को नुकसान पहुंचा. कोई भी किसान दिन-रात मेहनत कर अपने खून-पसीने से सिंचाई करता है फसल के भरोसे अपनी उम्मीदें लगाए बैठा होता है मगर ज़रा सोचिये क्या होगा जब एक रोज़ आप सवेरे उठते हैं और देखते हैं कि सारी फ़सल ओले से बर्बाद हो गई है यही वो कारण है जिसे कुछ लोग ये दबाव झेल नहीं पाते हैं. अभी हफ्ते दिनों पहले ही भोजपुर में एक प्राकृतिक आपदा हुई थी जिसमें कुछ लोगों पर इसका बुरी तरह से असर भी पड़ा जिसकी वजह से दशरथ बिन ने आत्महत्या कर लिया. ये मौते आर्थिक नीतियों, खेती के दबाव, फ़सल की नाकामी जैसे कारणों से हुई हैं. ये किसान परिवार कृषि संकट का हिस्सा रहा हैं और अब इनके ऊपर प्राकृतिक आपदा की दोहरी मार पड़ गई थी. इस ओलावृष्टि से गेहूँ की फसल पर भी इसका बहुत बुरा असर पड़ा है.

कर्ज में डूबे और खेती में हो रहे घाटे को किसान बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं. पिछले एक दशक के दौरान किसानों की आत्महत्या के हजारों मामले सामने आये हैं. अधिकतर किसानों ने कीटनाशक पीकर तो कुछ ने फांसी लगाकर अपनी जान दे दी है. किसानों पर सबसे अधिक मार बेमौसम बारिश, ओलावृष्टि और सूखे से पड़ती है तो कई बार दाम गिरने से भी इनकी कमाई पर असर पड़ता है. सरकार को भी नए योजनाओं को मजबूत किए जाने की ज़रूरत है ताकि किसानों को महसूस हो कि मुश्किल की घड़ी में सरकार उनके साथ खड़ी होगी.

किसानों की आय और सामाजिक सुरक्षा बढ़ाने की तमाम कोशिशों के बावजूद भारत में पिछले कई सालों से हजारों की तादात में किसान आत्महत्या कर रहे हैं और इस आत्महत्या की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं को किसानों की आय बढ़ाकर कम किया जा सकता है और शायद इसी समझ के साथ इस बार के बजट में केंद्र सरकार ने किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य रखा है मगर सवाल है आखिर कब तक ये किसान इंतजार करें और यूँ ही अपनी जान गंवाते रहें.

हम आपको यहाँ यह भी बताना चाहेंगे कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने वर्ष 2006 के जुलाई महीने में रामाधार की अध्यक्षता में राज्य किसान आयोग का भी गठन किया था. यह संभवतः आज़ादी के बाद किसी राज्य द्वारा गठित पहला किसान आयोग था और इस आयोग के मुख्य रूप से दो ही उद्देश्य थे पहला ये कि किसानों की समस्याओं का उनको समुचित समाधान देना तथा दूसरा ये कि किसानों की आय बढ़ाने के उपायों की तलाश करना मगर, इतने वर्षों में लगभग एक दशक से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी न तो किसानों की समस्याएं कम हुईं और न ही उनकी आय बढ़ी है.

हाल हीं में लोकसभा में केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने बताया है कि देश में 52 प्रतिशत कृषक परिवारों के क़र्ज़दार होने का अनुमान है. उन्होंने देश के ग्रामीण क्षेत्रों में 70वें राउंड के कृषि परिवार के सर्वेक्षण आंकड़ों के आधार पर यह बात कही थी. साथ ही साथ केंद्रीय मंत्री ने यह भी बताया था कि इस देश में हर एक किसान का परिवार औसतन 47,000 रुपये की भारी रकम के कर्ज में डूबा है.

किसानों की आत्महत्या के नवीनतम आंकड़ों से भी सरकार को गंभीर होने की जरूरत है क्योंकि एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2011 से लेकर 2015 तक कुल 64515 किसानों और कृषक मजदूरों ने आत्महत्या किया है जो कि भारत देश के लिए भविष्य में एक गहरे चिंता का विषय है. कृषि क्षेत्र में भारी संकट, किसानों के आत्महत्याओं की संख्या में बढ़ोतरी, किसानों के नक़दी फ़सलों की बर्बादी आने वाले दिनों में सिंहासन पर विराजमान सत्ताधारियों को सोचने पर मजबूर कर देंगी कि आखिर अब क्या किया जाये ?