आसमान से गिरे खजूर पर अटके

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अभी बहुत वक्त नहीं गुज़रे जब वो उनके साथ नज़र आने से बचते रहे। कई दिनों तक हालात इस शेर की तरह रहे –  खूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं, साफ छुपते भी नहीं, सामने आते भी नहीं ! फिर एकाएक उनमें एक दिन हिम्मत आ गई, या यूं कहें कि आत्मविश्वास के अतिरेक में उन्होंने 17 साल पुराना रिश्ता अपने को बड़ा और दूजे को कमतर जान तोड़ दिया। बड़े-बूढ़ों ने कहा है कि दुस्मन को कमज़ोर समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। पर वक्त का तकाज़ा था वे भूल गए कि शासन और सिंहासन जब बड़े-बड़े राजा-महराजाओं के नहीं रहे तो एक अदना सा मुख्यमंत्री क्या चीज़ है?

उनके पैरों तले की ज़मीन खिसक गई जब जिसे उन्होंने नकारा था वह राजगद्दी पर जा बैठा। नीतीश कुमार के लिए ये शर्म से पानी-पानी हो जाने का वक्त था। उन्होंने ऐसा ख्वाब में भी नहीं सोचा था कि नरेन्द्र मोदी को इतनी शानदार सफलता मिलेगी और अचानक उन दोनों के कद में ज़मीन-आसमान का फर्क आ जाएगा। पर समय किसका कब बदल जाए ये कोई नहीं जानता।

विडम्बना ये कि नरेन्द्र मोदी की इस जीत ने सारे राजनीतिक समीकरण बदल डाले। जिस लालू का भूत दिखा नीतीश 2005 से बिहार की जनता पर राज करते रहें, अचानक वक्त की मांग ने उन्हें लालू के दर पर खड़ा कर दिया। साथ ही वे मोदी की जीत से इतना असहज हो गए कि उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी तक छोड़ दी। इस त्याग को अलग-अलग नज़रों से देखा गया। ज्यादातर लोगों ने यह माना कि मुख्यमंत्री की हैसियत से नीतीश किस मुंह से मोदी से मिलते। उस अप्रिय सम्भावना को मिटा देना ही नीतीश ने उचित समझा। मोदी की जीत पर बधाई देने में भी उन्होंने काफी वक्त लिया और फेसबुक पर जब बधाई दिया भी तो यह कहकर कि उन्होंने कभी झूठ और मार्केटिंग का सहारा नहीं लिया। यह बात समझाने की जरूरत नहीं कि इशारा किधर था। मोदी की जीत को वह सिरे से खारिज़ कर रहे थे।

बड़ा सवाल ये है कि आखिर उन्हें हासिल क्या हुआ? जब तक भाजपा के साथ थे नीतीश कुमार का रुतबा कुछ अलग था। लालू के साथ आने पर उन्हें क्या मिल गया? नीतीश के लिए मोदी और लालू में अन्तर ही क्या है? जिस तरह मोदी उनके राजनीतिक जीवन के लिए अछूत थे, क्या लालू नहीं हैं? और अगर ऐसा नहीं तो अब तक दोनों साथ क्यूं नहीं दिखे? यह तो अजीब बात हो गई कि साथ हैं पर साथ दिखना नहीं चाहते।

नीतीश कुमार को उस तस्वीर से गज़ब की नफरत थी जिसमें वे मोदी का हाथ पकड़े हुए दिखाई देते हैं। उनके इस नापसन्द की कोई सीमा नहीं थी। मोदी के मुद्दे पर वे शिष्टाचार की सभी हदें पार कर देते थें जैसा कि उन्होंने भाजपा नेताओं के लिए दिए गए भोज को मना करके किया तो कभी बाढ़ के लिए मोदी के दिए 5 करोड़ को लौटाकर।

अब वे लालू के साथ क्या करेंगे? देश की राजनीति में लालू की छवि बहुत साफ नहीं मानी जाती तो क्या उनके साथ आने से नीतीश की छवि धूमिल नहीं होगी? और लालू तो नीतीश को बबूल का पेड़ और ना जाने क्या-क्या समझते थे। यहां तक कहा था कि नीतीश के पेट में दांत हैं यानी वे बहुत शातिर हैं।

ऐसा नहीं के वे एक-दूसरे के साथ बेहद खुश हैं। ये महज़ अपने राजनीति को ज़िंदा रखने की कवायद है। कहते हैं ना कि दुस्मन का दुस्मन दोस्त होता है। पर क्या दोनों कभी अपने बीच की बर्फ को पिघला पाएंगे।

जब उपचुनाव के लिए गठबन्धन पर प्रेस कान्फ्रेन्स हुआ तब भी दूसरे नेताओं ने कमान संभाली। नीतीश और लालू दिखे नहीं। पिछले 23 सालों में नीतीश और लालू ने कभी मंच साझा नहीं किया तो अब कैसे करें? इतना आसान भी नहीं होता यह् नीतीश जैसे राजनेता के लिए। और लालू से कांग्रेस का परहेज भी छुपा नहीं। लोक सभा चुनाव के दौरान किसी बड़े नेता ने लालू के साथ मंच साझा नहीं किया।

नीतीश अभी भी खुल कर नहीं बता रहे कि कब वो लालू के साथ दिखाई पड़ेंगे। वे सवाल यह कह कर टाल देते हैं कि अगर उपचुनाव के लिए साथ प्रोग्राम तय हुआ तो देखा जाएगा।

मीडिया को उस दिन का बेसब्री से इंतजार है।