औरंगाबाद: प्रकृति की सुंदरता और कदम-कदम पर बिखरा इतिहास

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बिहार के औरंगाबाद सूबे के आकर्षक शहरों में से एक है। औरंगाबाद शहर ऐतिहासिक घटनाओं के विरासत से गहरा रिश्ता है। जीवंत अतीत की आभा और करिश्मा के बल पर ये शहर यहां आने वालों के दिलों पर जादू चला देता है।

इस शहर का नाम भारत की आजादी की लड़ाई में व्यापक रुप से योगदान के लिए प्रसिद्ध है। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने यहां कई साल बिताए थे। औरंगाबाद आजादी के आंदोलन में एक बड़ी भूमिका निभाने वाले बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री सत्येन्द्र नारायण सिंह के पैतृक स्थान होने का गौरव भी रखता है।

औरंगाबाद में एक से बढ़कर एक खूबसूरत जगह है। जिसे देखने के बाद यहां से जाने का दिल नहीं करता। ये जगह चल्होद और दूारपाल नाम की पहाड़ियों से घिरी हुई है। ये जगह स्फसटिक, गोमेद और गार्नेट जैसे कई बहुमूल्य पत्थरों का श्रोत रहा है। औरंगाबाद में स्मारकों, मंदिरों और मस्जिदों की भरमार है। यहां दुनिया का प्रसिद्ध सूर्य मंदिर है। जिसके बारे में कहते है कि रातों-रात मंदिर ने अपनी दिशा बदल दी थी।

औरंगाबाद के सिपहसलार दाउद खां के नाम से बसा ये इलाका अपने अतीत को भूल चुका है। इस जाबंज सिपहसालार के दूारा निर्मित सैन्य छावनी प्रशासनिक एंव सरकारी उदासीनता के कारण खंडहर में तब्दील हो गई है। मुगल शासक औरंगजेब के शासनकाल के दौरान कलकत्ता से पटना जाने के रास्ते में अंक्षा परगना में लुटेरे राजस्व लूट लेते थे। उस वक्त औरंगजेब के इस बहादुर सिपाही ने उन लुटेरों को मार भगाया था। दाऊद खां की बहादुरी के किस्से अक्सर यहां के बूढ़े बताते है।

यहां आने वाले पर्यटकों की संख्या हर साल बढ़ रही है। इसके अलावे औरंगाबाद का सांस्कृतिक इतिहास मगध के चारों ओर घूमता है जो भारत के प्रारंभिक इतिहास का तीन चौथाई भाग है। बिहार के कई महान शासकों ने इस जगह पर राज किया था। मगधी और हिंदी यहां सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है।

औरंगाबाद 1972 में गया से अपने विभाजन के बाद एक स्वतंत्र जिला बना था। ये जगह महान सांस्कृतिक विविधता को दर्शाती है। यहां की मिट्टी धान, गेहूं और गन्ना की खेती के लिए उपयुक्त हा। सिंचाई योजना ने इस क्षेत्र को कृषि के लिए सबसे उपजाऊ और उपयुक्त बना दिया है।