कहर बरपा करने को बेकरार ये नदियां

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पटना: बिहार का शोक कही जाने वाली कोसी नदी मोनसून शुरु होते ही अपनी असली रुप दिखाने लगी है। कहर बरपा करने को मचलती हुई लहरों को देख लोग डरे-सहमे हैं। नेपाल में हो रही बारिश से नदी दिन प्रतिदिन खौफनाक रूप धरती जा रही है और इसके जद में आने वाले लोग भारी तबाही के डर से सो नहीं पा रहे हैं।

नेपाल के तराई क्षेत्र में हो रही बारिश से कोसी-कमला और इसकी सहायक नदियां उफान पर हैं। मधुबनी जिले के दर्जनों गांवों के निचले हिस्से में बाढ़ का पानी फैला हुआ है। कोसी क्षेत्र के लोगों का जीवन अब नाव के सहारे चल रहा है।

नदियों की उफनती धाराओं को देख संभावित बाढ़ से निपटने के लिए लोगों ने तैयारी शुरू कर दी है। वे अपने-अपने घरों में आटा, चावल, आलू, प्याज, सोयाबीन, नमक, केरोसीन तेल, गैस, माचिस, चूरा, चीनी सहित पशु चारा की व्यवस्था करने में जुट गए हैं।

बिहार में बाढ़ आने का मुख्य वजह पड़ोसी देश नेपाल है। मानसून आते ही नेपाल के पहाड़ी इलाके में भारी बारिश होती है। वर्षा का पानी नारायणी, बागमती और कोसी जैसी नदियों से होते हुए बिहार के मैदानी इलाके में पहुंचती है। अधिक पानी होने पर नदियों का तटबंध टूट जाता है और निचले इलाके बाढ़ के चपेट में आ जाते हैं।

बाढ़ से बचाव के लिए कोसी डैम और बांध बनाए गए हैं। नेपाल में स्थित इस डैम को भारतीय इंजीनियर कंट्रोल करते हैं। अधिक बारिश के चलते इस डैम के गेट को खोलना पड़ता है, जिससे निकलने वाला पानी बिहार में बाढ़ ला देता है।

बिहार के 68.9 लाख हेक्टेयर जमीन को बाढ़ संभावित क्षेत्र माना जाता है। सरकार ने इस इलाके में 3,465 किमी लंबा बांध बनवाया है। इसमें से करीब 3 हजार किमी लंबा बांध कोसी के दोनों ओर बनाया गया है। इसके बावजूद बाढ़ का खतरा कम नहीं होता।

कोसी अपना रास्ता बदलने के लिए बदनाम है। बारिश के पानी से भरी नदी जब रास्ता बदलती है तो किनारे पर मिट्टी का भारी कटाव होता है और बड़ा से बड़ा बांध टिक नहीं पाता।

कोसी ने 2008 में कहर बरपाया था। पिछले 50 साल में बिहार में ऐसा बाढ़ नहीं आया था। बाढ़ ने 250 लोगों की जान ले ली थी और लाखों लोग बेघर हो गए थे। करीब 3 लाख घरों और 8 लाख 40 हजार एकड़ में लगी फसल नष्ट हो गए थे। बिहार के अररिया, पूर्णिया, किशनगंज, मधेपुरा, सहरसा और सुपौल जिले इससे सबसे अधिक प्रभावित हुए थे।