कृषि विभाग ने किया राज्य स्तरीय रबी कर्मशाला-2016 का आयोजन

649
0
SHARE

पटना: पटना के सभागार में कृषि विभाग द्वारा दो दिवसीय राज्य स्तरीय रबी कर्मशाला का आयोजन गुरुवार को किया गया। इस कार्यक्रम का उद्घाटन राम विचार राय, माननीय मंत्री, कृषि विभाग, बिहार द्वारा किया गया। इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में सुधीर कुमार, प्रधान सचिव, कृषि विभाग मौजूद थे।

जबकि इस कार्यक्रम की अध्यक्षता हिमांशु कुमार राय, कृषि निदेशक द्वारा किया गया। इस अवसर पर अरविन्दर सिंह, निदेशक, उद्यान, रवीन्द्र नाथ राय, विशेष सचिव, धनंजयपति त्रिपाठी, निदेशक, पीपीएम, गुलाब यादव, निदेशक, भूमि संरक्षण, बैंकटेश नारायण सिंह, निदेशक, बिहार राज्य बीज प्रमाणन एजेन्सी, गणेश राम, निदेशक, बामेती, कृषि विश्वविद्यालयों के कृषि वैज्ञानिक, मुख्यालय एवं क्षेत्रीय पदाधिकारीगण सहित राज्य के प्रगतिशील किसान तथा कृषि उपादान के बिक्रेता/प्रतिष्ठान के प्रतिनिधि उपस्थित थे।

माननीय मंत्री द्वारा अपने संबोधन में कहा गया कि रबी अभियान एक बहुत महत्त्वपूर्ण अभियान है। इस बार अच्छी वर्षा के कारण खरीफ फसलों का उत्पादन आशा के अनुरूप होने की संभावना है। उन्होंने निर्देश दिया कि रबी में निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए किसानों को समय पर सही बीज, सही खाद, सही पौधा संरक्षण रसायन उपलब्ध कराना सुनिश्चित किया जाये।

उन्होंने आगे कहा कि माननीय मुख्यमंत्री जी के सपना को किसानों की आमदनी में वृद्धि के साथ-साथ फसलों की उत्पादकता बढ़ाकर पूरी करना है। माननीय कृषि मंत्री ने रबी, 2016-17 में फसलों के आच्छादन एवं उत्पादन के लक्ष्यों के बारे में विस्तृत जानकारी दी। साथ ही, उन्होंने कहा कि प्रमंडल, जिला, प्रखण्ड स्तर पर आयोजित होने वाले रबी महाभियान के लिए सभी पदाधिकारियों की जवाबदेही तय कर दी गई है। इस अभियान में अच्छे कार्य करने वाले पदाधिकारियों को सम्मानित किया जायेगा तथा खराब प्रदर्शन करने वाले पदाधिकारियों को दंडित भी किया जायेगा। उन्होंने सभी पदाधिकारियों को योजनाओं के लक्ष्य के अनुरूप उपलब्धि प्राप्त करने का निदेश दिया।

इस अवसर पर सुधीर कुमार, प्रधान सचिव, कृषि विभाग ने कहा कि फसलों के उत्पादन एवं उत्पादकता सबसे कम वर्ष 2014-15 एवं 2015-16 में था। इसका मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन विशेषकर सामान्य से कम वर्षापात होना है। इस वर्ष मौनसून लगभग सामान्य रहा है। इसलिए रबी मौसम में फसलों के उत्पादन एवं उत्पादकता के लक्ष्य को पूरा करने के लिए कर्मशाला के पहले दिन छः महत्वपूर्ण विषयों यथा- राज्य में डीबीटी का कार्यान्वयन, अनुदानित दर पर बीज वितरण, जैविक खेती का क्रियान्वयन, फल एवं सब्जी का मूल्य संबर्द्धन, जिरो टिलेज से गेहूं की खेती तथा आवश्यकता के अनुसार दलहन उत्पादन जैसे विषयों पर सुझाव प्राप्त करने हेतु विषयवार टीम का गठन किया गया। इस टीम में कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक, मुख्यालय एवं जिला स्तर के पदाधिकारी, प्रगतिशील किसान तथा उपादान के बिक्रेता/प्रतिष्ठान के प्रतिनिधि को सम्मिलित किया गया। प्रत्येक टीम से प्राप्त सुझाव के अनुरूप रबी के कार्यक्रम क्रियान्वित किये जायेंगे। साथ ही, 2017 में बनने वाले नये कृषि रोड मैप में भी इन विषयों को सम्मिलित किया जायेगा।

रबी 2016-17 में 23.25 लाख हे0 में गेहूँ के आच्छादन का लक्ष्य एवं उत्पादन का लक्ष्य 79.05 लाख मे० टन रखा गया है। साथ ही, गेहूँ की उत्पादकता को बढ़ाकर 3,400 किलोग्राम प्रति हेक्टर रखने का कार्यक्रम बनाया गया है।

गेहूं के उत्पादन में वृद्धि लाने हेतु गेहूं की बोआई नवम्बर माह के अंत तक करना है, धान वाले खेत में दिसम्बर में भी गेहूं की बोआई की जा सकती है। जिरो टिलेज मशीन से गेहूं की बोआई कर समय एवं पैसा दोनों का बचत करते हुए इसके उत्पादन एवं उत्पादकता में वृद्धि की जा सकती है।

प्रमाणित बीजों का उपयोग, संतुलित मात्रा में मिट्टी जांच के आधार पर उर्वरक व्यवहार, समेकित खरपतवार एवं कीट-व्याधि नियंत्रण करने से रबी फसलों का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है।

रबी मक्का उत्पादन कार्यक्रम के तहत् वत्र्तमान रबी मौसम में 4.25 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में मक्का का आच्छादन लक्ष्य रखा गया है और इसका उत्पादन का लक्ष्य 22.00 लाख मे. टन निर्धारित किया गया है।

रबी/गर्मा में दलहनी फसलों के आच्छादन का लक्ष्य 11.50 लाख हेक्टेयर तथा उत्पादन का लक्ष्य 13.35 लाख टन रखा गया है, जिनमें चना, मसूर, मटर एवं अन्य दलहनी फसलें का उत्पादन लक्ष्य क्रमशः 1.98, 2.55 तथा 2.55 लाख टन निर्धारित किया गया है।

क्षेत्र विशेष हेतु अनुशंसित कीट प्रतिरोधी प्रभेदों का प्रयोग, ज्यादा से ज्यादा मात्रा में बीजों का राइजोबियम कल्चर के साथ बीजोपचार, सिंगल सुपर फास्फेट या डाइअमोनियम फास्फेट के उपयोग, स्प्रिंक्लर मशीन से सिंचाई तथा समेकित कीट प्रबंधन अपनाकर दलहनी फसलों का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है।

राज्य में खाद्य तेलों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए तेलहनी फसलों की खेती होती है। इनके आच्छादन एवं उत्पादकता को बढ़ाने की पर्याप्त संभावनाएँ हैं। इसके अन्तर्गत सभी अनुशंसित शष्य क्रियाओं को उपयोग कर प्रति हेक्टर औसत उत्पादन एवं उत्पादकता में वृद्धि लाया जा सकता है।

वर्ष 2016-17 के रबी/गर्मा में विभिन्न तेलहनी फसलों के आच्छादन का लक्ष्य 2.00 लाख हेक्टेयर एवं उत्पादन का लक्ष्य 3.13 लाख मे० टन रखा गया है। जिनमें राई/सरसों/तोरी, तीसी, सूर्यमुखी एवं तिल का उत्पादन लक्ष्य क्रमशः 1.86, 0.65, 0.59 एवं 0.03 लाख मे॰ टन निर्धारित किया गया है।

इन तेलहनी फसलों का उत्पादन लक्ष्य प्राप्त करने के लिए यथासंभव सिंचित क्षेत्र में राई/सरसों/तीसी की खेती करनी चाहिए। संतुलित मात्रा में उर्वरक का प्रयोग, अनुशंसित अधिक उपजशील प्रभेदों का प्रयोग, दियारा क्षेत्रों में भी तेलहनी फसलों की खेती कर इनके उत्पादन में अपेक्षित वृद्धि किया जा सकता है।

साथ ही, अन्य खाद्यान्नों जैसे गेहूं इत्यादि फसलों के साथ तेलहनी फसलों की मिश्रित खेती कर इसके उत्पादन लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। नहर के सुदूर क्षेत्र, जहाँ कम पानी रहने की संभावना बनी है, वहां तेलहनी फसलों की खेती की जाये। समेकित कीट-व्याधि प्रबंधन, प्रत्यक्षण एवं कृषक प्रशिक्षण कराकर तेलहनी फसलों की खेती में अपनायी जाये।

राज्य में राजकीय बीज गुणन प्रक्षेत्रों में बीज उत्पादन का कार्यक्रम चलाया जा रहा है। चालू वित्तीय वर्ष में इन बीज गुणन प्रक्षेत्रों पर गेहूँ का 20,854 क्विं॰, चना का 1,275 क्विं॰, मसूर का 3,600 क्विं॰, मटर का 405 क्विं॰, राई/सरसों का 500 क्विं॰, जई का 400 क्विं॰ एवं तीसी का 250 क्विं॰ आधार बीज उत्पादन करने का लक्ष्य रखा गया है। इस प्रकार, राजकीय गुणन प्रक्षेत्रों पर इन फसलों के 27,284 क्विं॰ आधार बीज का उत्पादन किया जायेगा।

वर्ष 2016 को दलहन वर्ष घोषित किया गया है। विश्वविद्यालय अपने कार्यक्रमों के माध्यम से राज्य में दलहनी फसलों की गुणवत्तापूर्वक उत्पादकता में अभिवृद्धि का भरपूर प्रयास करेगा। बीज उत्पादन के मामले में राज्य को आत्मनिर्भर बनाने खासकर दलहनी फसलों के उत्पादन एवं उत्पादकता बढ़ाने के लिए उसके बीज प्रतिस्थापन दर को विशेष रूप से वृद्धि करने हेतु विभाग आवश्यक कदम उठा रहा है।

कृषि विश्वविद्यालयों के विभिन्न संभागों द्वारा किसानों के हित में किये जा रहे प्रसार तथा शोध कार्यों से संबंधित वैज्ञानिक आवश्यक तकनीकी ज्ञान से किसानों को अवगत कराते हैं, जिनसे किसानों को उनके कृषि जलवायु क्षेत्र के अनुसार उनके द्वारा किये जा रहे कृषि कार्यों में नई तकनीक अपनाने में सहयोग प्राप्त होता है।