कॉफ़ी विद फिल्म में दिखलाई गई अंतर्द्वंद

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कॉफ़ी विद फिल्म की तीसरी कड़ी में राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फीचर फिल्म अंतर्द्वंद दिखलाई गई| फिल्म बिहार-उत्तर प्रदेश में वैवाहिक रिश्तों को लेकर घटित घटनाओं की कथा कहती है| बीते दिनों सामाजिक विषमता के कारण पकरौआ बियाह जैसे घटनाएँ अक्सर सुर्ख़ियों में रहता था| फिल्म उन्हीं रिश्तों के बीच हो रहे अंतर्द्वंद को चित्रित करती है| फिल्म क्लब के संयोजक एवं युवा फिल्मकार रविराज पटेल ने कहा हमारी कोशिश है कि कॉफ़ी विद फिल्म में ऐसे फिल्मों से साक्षात्कार करवाना जो हमारे ही बीच सृजित हुई हो लेकिन हमारे सिनेमा घरों तक उसकी पहुँच नहीं बन पाई| अंतर्द्वंद उन्हीं में से एक फिल्म है| इस फिल्म को राष्ट्रीय सम्मान तो मिला लेकिन आम दर्शकों तक इसकी पहुँच अधूरी रह गई| आगे भी क्लब की यही कोशिश होगी कि हम वैसी ही फिल्मों का प्रदर्शन करें, जो बिहार के फिल्मकारों या बिहार के पृष्ठभूमि पर आधारित होते हुए भी हम उसके दर्शक नहीं हो पाए हैं| मौके पर फिल्म क्लब के अध्यक्ष आर.एन. दास, कला समीक्षक विनय कुमार, फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम, कला निर्देशक अभिषेक सिंह, डॉ. मनीषा प्रकाश, मिनती चकलानवीस, प्रियंका सिंह, अतुल शाही आदि मौजूद थे|

फिल्म में विनय पाठक, अखिलेन्द्र मिश्रा, राजा चौधरी, स्वाति सेन, शक्ति कुमार आदि ने शानदार अभिनय किया है| जबकि फिल्म का निर्देशन सुशील राजपाल, सिनेमेटोग्राफी मलय राय, संगीत निर्देशन बापी-टुटुल एवं संपादन असीम सिन्हा ने किया है|

अंतर्द्वंद की कथा पेचीदा है लेकिन मैंने साधारण एवं सामान्य तरीके से इसका फिल्मांकन किया है, जो बीते दिनों के उत्तर भारत में अक्सर घटित पकरौआ बियाह के घटनाओं पर आधारित है| 2009 में सामाजिक मुद्दों के श्रेणी में इस फिल्म को सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था| व्यावसायिक रूप से यह फिल्म 27 अगस्त 2010 को पीवीआर के माध्यम से रिलीज हुई थी| मैं शुक्रगुजार हूँ रविराज पटेल का जिन्होंने बिहार फिल्म क्लब द्वारा संचालित कॉफ़ी विद फिल्म में दिखाने के लिए इस फिल्म को चुना| बिहार में सरकार के स्तर से फिल्मों के प्रति संजीदगी बढ़ी है, इसके लिए बिहार सरकार सहित बिहार राज्य फिल्म विकास एवं वित्त निगम लिमिटेड को मैं बधाई देता हूँ|
मुंबई से टेलीफोनिक सुशील राजपाल
निर्देशक, अंतर्द्वंद

मैं बिहार का हूँ| फिल्म का विषय बीते दिनों बिहार एवं उत्तर प्रदेश का सत्य रहा है| इस तरह के घटनाओं को समाचार पत्रों में पढ़ कर या अपनों से सुनकर मेरी उत्कंठा हुई कि इस तरह की घटनाएं समाज में आखिर क्यों और कैसे हो रही हैं? उसे करीब से समझते हुए महसूस किया, फिर उसे एक कहानी का आकार दिया| तत्कालीन समय की सामाजिक समस्याओं में यह एक जवलंत मुद्दा था| सुशील राजपाल जी कहानी को सुनते ही इस पर फिल्म बनाने का निर्णय किया, फिल्म की पूरी शूटिंग बिहार में हुई और राष्ट्रीय सम्मान हासिल किया| ख़ुशी है कि अंतर्द्वंद बिहार फिल्म निगम के कॉफ़ी विद फिल्म के माध्यम से अपनों के बीच दिखाई गई|

अमिताभ वर्मा
कथा, पटकथा एवं संवाद लेखक