क्यों कहते हैं कुँवर सिंह भी बड़ा वीर मर्दाना था

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पटना – “वीर भक्त का वही जाह्नवी को मानो नजराना था, सब कहते हैं कुँवर सिंह भी बड़ा वीर मर्दाना था”

जगदीशपुर के राजमहल में एक वृद्ध युवक के दिल में अंग्रेज शासक के कारनामों के विरुद्ध प्रतिहिंसा की लहरें तरंगित हो रही थी. आसन्न संकट की संभावना की प्रतिक्रया में वह उद्वेलित हो रहा था. इसी समय दानापुर छावनी के पलटनों ने राजमहल में उपस्थित होकर उस वृद्ध युवक कुँवर सिंह से महाक्रान्ति का नेतृत्व सम्हालने का निवेदन किया. इन्हें एक वीर पुरुष का नेतृत्व मिल गया. जीवन के 80 बसंत गुजार चुके उस वृद्ध की भुजाओं में दुश्मनों को भू-लुंठित करने का महान सामर्थ्य विद्यमान था. विशाल वक्षस्थल में शिला को खण्ड-खण्ड करने की शक्ति संचित थी.

वीर कुँवर सिंह ने दानापुर छावनी रेजीमेंटों के बगावती पलटनों तथा लगभग चार हजार सैनिकों के साथ अंग्रेजों के विरुद्ध क्रान्ति का बिगुल फूँक दिया. समस्त पश्चिमी बिहार में क्रान्ति की लहर फ़ैल गई. कुँवर सिंह के भाई अमर सिंह भी बहादुरी के साथ अंग्रेजों सरकार के विरुद्ध जंग में कूद पड़े. कुँवर सिंह ने तात्या टोपे से भी संपर्क किया. नाना साहब के साथ मिलकर ब्रिटिश सेना को पराजित किया. गंगा पार करते हुए अंग्रेज सेना की गोली कुँवर सिंह के हाथ में लगी और उन्होंने वहीँ गोरी सेना के अपवित्र गोली से घायल हाथ अपनी तलवार से काट कर गंगा मैया को भेंट चढ़ा दी.

वीर कुँवर सिंह भारत माँ के ऐसे वीर सपूत थे, जिन्होंने वृद्धावस्था में शूरमाओं का शूरमा बन गए. उन्होंने जीते जी न तो पराजय स्वीकार की और न ही पराधीनता. वीरता से लड़ते हुए युद्ध में घायल होने के बाद स्वातंत्र्य ध्वज के तले ही विजित राजसिंहासन पर उन्होंने 26 अप्रैल, 1958 को वीर-गति प्राप्त की. इस प्रकार स्वाधीनता को अपना जन्म सिद्ध अधिकार समझकर 1857 की क्रांति में वीर कुँवर सिंह ने विप्लव का एक भयानक आत्म बलिदानी स्वरुप प्रकट किया था.