गौतम बुद्ध की साधना भूमि – वैशाली

980
0
SHARE

वैशाली – बिहार की वैशाली वह भूमि है, जो गौतम बुद्ध की साधना भूमि रही थी. उनके तपश्चर्या के अधिकांश समय वैशाली में ही व्यतीत हुए. ईसा से लगभग 623 वर्ष पूर्व क्रांतिकारी दार्शनिक चिन्तक और इस चिंतन से उपलब्ध सर्वोच्च सत्य के व्यापक प्रचार-प्रसार के क्षेत्र में भारत भूमि पर इस महान परिव्राजक का आविर्भाव हुआ था, जिसे संसार भगवान बुद्ध के नाम से जानता है.

भगवान बुद्ध का कई बार वैशाली आगमन हुआ था. पहली बार वे तब आए थे, जब वैशाली में महामारी फैली थी. इस भयंकर विपत्ति से मुक्ति पाने के लिए लिच्छवियों का अनुरोध स्वीकार कर, 500 भिक्षुओं के साथ वैशाली आए थे. इतिहास के पन्ने यह बताते हैं कि जब गंगा किनारे नाव से उतर कर जैसे ही भगवान बुद्ध ने वज्जि भूमि पर पर्दापण किया, आकाश में जोर से गर्जना हुई और मुसलाधार बारिश होने लगी. भगवान बुद्ध के वैशाली नगर के निकट पहुँचते ही सम्पूर्ण प्रदेश से महामारी विदूरित हो गई. उनके शिष्यों की मंडली में मगध राज बिम्बसार, प्रियदर्शी अशोक, ब्राह्मण सारिपुत्र नामक असाधारण ऐश्वर्यशाली वणिक ने अपनी सारी भूमि को स्वर्ण मुद्राओं के मूल्य पर उसे ख़रीदा और भिक्षु संघ को समर्पित कर दिया. इतना ही नहीं, वैशाली की अप्रतिम सुन्दरी नर्तकी अम्बपाली के अतिरिक्त चालिका वन में दारुण उत्पात मचाने वाला क्रूर दस्यु अंगुलीमाल के नाम भी ‘बुद्धं शरणं गच्छामि, संघ शरणं गच्छामि’ में उल्लेखनीय है.

वैशाली – पौराणिक अवशेष – सामाजिक तथा राजनीतिक स्थितियाँ

लगभग 100 वर्ष पूर्व की गई खुदाईयों में जो हजारों मुद्राएं मिली है, इससे पता चलता है कि गुप्तकालीन वैशाली में सार्वजनिक जीवन बेहद उन्नतशील अवस्था में था. इतना संपन्न सामुदायिक जीवन अन्य किसी ऐतिहासिक राजधानी पर नहीं मिलता है. इसका कारण अवश्य ही वहां की तत्कालीन गणतांत्रिक शासन-पद्धति रही होगी. अशोक महान द्वारा निर्मित अशोक स्तंभ एक काल पात्र जैसा है और उत्खनन के बाद अशोक स्तंभ के समीप का दृश्य इतिहास के झरोखे में झाँकने के लिए हमें विवश करता है.

इतना ही नहीं, ‘विश्व शान्ति स्तूप’ जो एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्तंभ है. यह परमात्मा के रूप में अपनी शांति के आकर्षण के लिए, 400 मीटर की ऊंचाई पर पहाड़ी के उच्चतम बिंदु पर स्थित है. स्तूप बुद्ध की चार स्वर्ण प्रतिमाओं को स्थापित करते हुए, विश्व शांति के प्रतीक सफ़ेद संगमरमर पत्थर से बना है. यहाँ रोपवे के माध्यम से जाया जा सकता है.

प्रसिद्ध चीनी बौद्ध यात्री फाहियान (319-414 ई.) ने जो गणराज्य के पतन के 87 वर्ष बाद 406 ई. में वैशाली होकर गुजरा था, अपने यात्रा वृत्तांत में यहाँ के महावन-विहार आम्रपाली निर्मित स्तूप और आम्रपाली वन की चर्चा की है.

लिच्छवियों की न्याय-व्यवस्था के जैसा उदाहरण प्राचीन भारत के गणराज्यों में कहीं नहीं मिलता है. निर्दोष व्यक्ति को अपराधी सिद्ध करना असंभव था क्योंकि अभियुक्तों की सुनवाई होने पर केवल अंतिम न्यायालय, जिसका न्यायाधीश स्वयं गणप्रमुख होता था. ऐतिहासिक प्रमाण से यह पता चलता है कि स्त्रियों के संबंध में कठोर नियम की बातें थीं. कोई भी नारी या कन्या को किन्हीं अन्य पुरुष के प्रति नाजायज आशक्ति के कारण कड़ा से कड़ा दंड लागू किया जाता था. इन सब ऐतिहासिक अन्वेषण से तो यही ज्ञात होता है कि वैशाली एक समृद्ध नगर था.