चाल पर चाल

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डॉ मनीषा प्रकाश

 

होर्डिंग, पोस्टर, टीवी पर विज्ञापन या फिर बयानों के तीर तो चल रहे हैं जिसे हर कोई देख और समझ रहा है पर अंदरखाने में कुछ ऐसी भी चालें होती हैं जिसे वक्त पर समझना मुश्किल होता है पर बाद में इसका विश्लेषण होता है कि कौन सा तीर निशाने पर लगा था।

बिहार चुनाव में हर पल हर पार्टी नए-नए चाल चल रही है, कहीं दुश्मनों के खिलाफ साजिश हो रही है तो कहीं दोस्तों से ही पैंतरेबाजी हो रही है। जीत और हार के बीच इस बार का फासला बहुत ही कम है। दुश्मन भी चालाक और होशियार है। इसलिए साम, दाम, दंड, भेद सब अपनाए जा रहे हैं। एक-एक कर समझेंगे कौन दे रहा है शह और किसकी होगी मात।

बीजेपी की चाल

लालू और नीतीश से निपटने में बीजेपी अपनी तरफ से हर वो कोशिशें कर रही है जिससे वो इस चुनाव में पीएम मोदी के रथ को आगे बढ़ा सके। उसका मुकाबला महागठबंधन से तो है ही, साथ ही अपने सहयोगी दलों को नाथने में कोई कसर नहीं छोड़ रही। बीजेपी ने ऐलान किया था कि वो कम से कम 175 सीट पर लड़ना चाहती है। अपने सहयोगियों के लिए सिर्फ 68 सीटें ही छोड़ रही थी। आखिर क्यों 102 सीटों पर लड़ने वाली बीजेपी 175 सीटों पर लड़ना चाहती है। दरअसल बीजेपी को नीतीश से अलग होने के बाद अपने सहयोगियों पर भरोसा नहीं है। राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के अध्यक्ष उपेन्द्र कुशवाहा हों या लोक जनशक्ति पार्टी के चिराग पासवान या फिर हम के जीतन राम मांझी, ये तीनों ही क्षेत्रीय पार्टियां हैं और तीनो का लक्ष्य एक है – मुख्यमंत्री पद की कुर्सी।

उपेन्द्र कुशवाहा जेडीयू के साथ लम्बे समय तक तो चले पर बाद में कई पार्टियों के साथ रिश्ते जोड़े और फिर अलग हो गए। आखिर में अपनी पार्टी बनाई। अब एनडीए में साथ हो गए। नरेन्द्र मोदी कैबिनेट में मंत्री हैं पर तमन्ना है बिहार का मुख्यमंत्री बनने की। ऐसे में कहीं ऐसा हुआ कि उपेन्द्र कुशवाहा कि सीटें ज्यादा आ गईं और बीजेपी से अलग होकर मुख्यमंत्री पद का ऑफर मिल गया तो एनडीए से नाता तोड़ लें ये कोई अचरज की बात नहीं होगी। दूसरी तरफ एलजेपी का इतिहास कुछ इसी तरफ इशारा करता है। केन्द्रीय मंत्री राम विलास पासवान के बारे में कहा ही जाता है कि ये सत्ता के मौसम वैज्ञानिक हैं। बिहार में अगर एलजेपी को सीटें ज्यादा मिल जाएं और जीत हो जाए तो इनका भी मन डगमगा जाएगा इससे इंकार नहीं किया जा सकता। जीतन राम मांझी को कुर्सी इसलिए छोड़ना पड़ा क्यूंकि वो सीएम पद से हटना नहीं चाहते थे। इसलिए इनकी महत्वाकांक्षा भी हिलोरे मार रही है। रह-रह कर उनका भी बयान आ जाता है कि किसी दलित को ही मुख्यमंत्री बनाया जाना चाहिए। बीजेपी के तीनो सहयोगी साथ तो हैं पर कब तक रहेंगे ये चुनाव के नतीजे ही तय करेंगे।

लालू की चाल

लालू की चाल उस वाक्ये से आसानी से समझा जा सकता है जिसमें उन्होंने नीतीश को मुख्यमंत्री बनाना ज़हर पीने जैसा बताया था। लालू ने ये साफ कर दिया है कि समय की नज़ाकत को देखते हुए नीतीश के साथ जाना मज़बूरी है लेकिन एक बार नतीज़े आ जाएं तो फिर फ़ैसला लेना तो उनके बाएं हाथ का खेल है। लालू की मज़बूरी अपनी नहीं बल्कि अपने बेटों को लेकर ज्यादा है। दोनों बेटे तेजस्वी और तेज प्रताप अपने राजनीतिक जीवन की पहली परीक्षा देने वाले हैं। उनकी जीत सुनिश्चित करना लालू की पहली प्राथमिकता है और बगैर नीतीश के फिल्हाल ये संभव भी नहीं दिखता। एक बार लालू नीतीश के सहारे ज्यादा सीटों पर जीत हासिल करने में कामयाब हो गए तो लालू रामविलास के उसे कहे को चरितार्थ कर सकते हैं — एक हाथ गर्दन पर और एक हाथ पांव पर।

नीतीश की चाल

नीतीश ने लालू के ज़हर वाले बयान के जवाब में उनकी तुलना सांप से की। ऐसे में सांप के विष से बचने के लिए अभी से तैयारी शुरु कर ली है। लालू चुनाव बाद नीतीश को झटका दे सकते हैं इसका आभास उन्हें बखूबी है। यही वज़ह है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के साथ न सिर्फ संपर्क में हैं बल्कि उनके साथ भविष्य की योजनाएं भी तैयार कर रहे हैं। नीतीश इस चुनाव के बाद सत्ता में आए या न आए लेकिन 2019 के लोक सभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी को हराने के लिए मजबूत गठजोड़ बनाने की रणनीति पर जबरदस्त तरीके से काम कर रहे हैं।