जंगल राज तो नहीं पर बदनामी के दौर में बिहार

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जेडीयू बताए कौन है भ्रष्टाचारी? मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कह रहे हैं कि भ्र्ष्टाचार से समझौता नहीं पर भ्रष्टाचारी का नाम लेने में डर क्यों रहें हैं? जेडीयू के नेता धीरे-धीरे मुँह खोल रहे हैं पर नाम अब भी नहीं ले रहे। आखिर राज़ क्या है?

जेडीयू की बैठक में तीन नेताओं ने अहम बात कही। विधायक गिरधारी यादव ने कहा कि जब भी किसी अफसर को कोई काम बताते हैं तो वो अफसर कहते हैं आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव का फोन आ गया है आप ही बताइए उनकी बात कैसे नहीं माने। लालू यादव किसी भी अफसर को फोन कर काम करने को कहते हैं। सज़ायाफ्ता लालू बिहार के अधिकारियों को तो आदेश-निर्देश देते ही हैं साथ ही कनीय अधिकारियों को भी हड़का देते हैं। अधिकारी जब किसी मामले में फंस जाते हैं तो उन्हीं से पैरवी भी करते हैं कि उनको बचा लें।

दूसरे विधायक श्याम बहादुर ने तो यहां तक कह दिया कि लालू की वजह से उनकी (नीतीश की) बड़ी बदनामी हो रही है। बदनाम नेता के साथ चलने से बेहतर है चुनाव में चलें। एक विधायक ने कहा कि बिहार में आपकी छवि बेदाग थी, आज लोग बहुत बुरा कह रहे हैं। लालू से छुटकारा पाने की बेचैनी लगभग जेडीयू नेताओ में देखी गई। हर नेता बिहार की सियासत में हो रहे उठापटक से परेशान है पर सवाल ये कि आखिर कोई तेजस्वी का नाम लेकर क्यों नहीं कह रहा कि उसके चलते नीतीश बदनाम हो रहे हैं।

दरअसल सियासत के माहिर खिलाड़ी नीतीश जानते हैं कि उनकी तरफ से एक भी चूक उनके वोट बैंक को तबाह कर सकता है। बीजेपी के साथ जाने पर उनकी छवि को और दाग लग सकता है। अगर लालू ने महागठबंधन को तोड़ा तो नीतीश बच सकते हैं। इसलिए धैर्य के साथ फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं।

हाल ही में आरजेडी समर्थकों ने रिपब्लिक टीवी के रिपोर्टर के साथ लालू के घर के बाहर बदसलूकी की। बुधवार को कैबिनेट के बाद तेजस्वी के सुरक्षाकर्मियों ने पत्रकारों के साथ मारपीट की। पिछले चार महीने से शहाबुद्दीन और जमीन घोटालों की ही चर्चा हो रही है। बिहार में अभी जंगल राज नहीं लौटा है पर शासन पर सवाल उठने लगे हैं। महागठबंधन रहे या टूट जाए इससे जनता को कोई फर्क नहीं पड़ता पर अगर बिहार एक बार फिर बदनामी के दौर में आ जाए तो देश में बिहारियों की किरकिरी तय है। बिहारी कहलाना गर्व नहीं बल्कि शर्म की बात होगी।