जननायक कर्पूरी ठाकुर की जयंती आज

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सुप्रिया सिन्हा

पटना- भारत के स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षक एवं राजनीतिज्ञ कर्पूरी ठाकुर का जन्म आज ही के दिन 24 जनवरी 1924 में बिहार के समस्तीपुर के पितौंझिया गांव में हुआ था। लोकप्रियता के कारण उन्हें ‘जननायक’ कहा जाता है। कर्पूरी ठाकुर 22 दिसंबर 1970 से 2 जून 1971 तथा 24 जून 1977 से 21 अप्रैल 1979 के दौरान दो बार बिहार के मुख्यमंत्री पद पर रहे। वे सदा गरीबों के हक के लिए लड़ते रहे। मुख्यमंत्री रहते हुए पिछड़ों को 27% आरक्षण दिया। उनकी सेवा भावना के कारण ही उन्हें जननायक कहा जाता था। 1952 की पहली विधानसभा में चुनाव जीतने के बाद वे बिहार विधानसभा का चुनाव कभी नहीं हारे।

ईमानदारी के मशाल कर्पूरी ठाकुर के बारे में बताया जाता है कि जब वे राज्य के मुख्यमंत्री थे तो उनके बहनोई उनके पास नौकरी की सिफारिश लेकर गए। उनकी बात सुनकर कर्पूरी ठाकुर गंभीर हो गए और जेब से पचास रुपये निकालकर उन्हें दिया और कहा, “जाइए, उस्तरा आदि खरीद लीजिये और अपनी पुश्तैनी धंधा आरंभ कीजिये।” कर्पूरी ठाकुर के वाणी पर कठोर नियंत्रण था। वे भाषा के कुशल कारीगर थे। उनका भाषण आडंबर रहित, ओजस्वी एवं उत्साहवर्धक होता था। 1967 के आम चुनाव में राममनोहर लोहिया के नेतृत्व में गैर कांग्रेसवाद का नारा दिया। कांग्रेस पराजित हुई बिहार में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी।

बेदाग छवि के कर्पूरी ठाकुर आजादी से पहले 2 बार और आजादी मिलने के बाद 18 बार जेल गए। कर्पूरी के ‘कर्पूरी ठाकुर’ होने की कहानी बहुत दिलचस्प है। बताया जाता है कि समाजवादी नेता रामनन्दन मिश्र का समस्तीपुर में भाषण होने वाला था जिसमें छात्रों ने कर्पूरी ठाकुर से अपने प्रतिनिधि के रूप में भाषण कराया। उनके ओजस्वी भाषण को सुनकर मिश्र ने कहा कि यह कर्पूरी नहीं, ‘कर्पूरी ठाकुर हैं तभी से कर्पूरी, कर्पूरी ठाकुर हो गए। उनकी मृत्यु 17 फरवरी 1988 में 64 साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ने के कारण हुई।

बिहार में कर्पूरी जयंती समारोह को लेकर सियासत गर्म है। बिहार में बीजेपी , जदयू और राजद के बीच कर्पूरी ठाकुर की विरासत को लेकर जंग छिड़ी है। बीजेपी के नेताओं ने एक स्वर में राजद पर हमला करते हुए कहा कि राजद को कर्पूरी जयंती मनाने का नैतिक अधिकार नहीं क्योंकि राजद उनके आदर्श के विपरीत केवल परिवारवाद पर ध्यान दिया जाता है।