जन्मदिन विशेष: निर्मल स्वभाव के महान व्यक्ति राजेंद्र प्रसाद

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गणतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति और देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद की 132वीं जयंती पर आज पूरा देश उन्हें याद कर रहा है। राजेंद्र प्रसाद सादगी पसंद व्यक्ति थे। अत्यंत दयालु और निर्मल स्वभाव के महान व्यक्ति थे। देश और दुनिया उन्हें एक विनम्र राष्ट्रपति के रूप में उन्हें हमेशा याद करती है। सादा जीवन, उच्च विचार के अपने सिद्धांत का निर्वाह उन्होंने जीवन र्पयत किया।

डॉ राजेंद्र प्रसाद ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि गोपाल कृष्ण गोखले से मिलने के बाद वे आज़ादी की लड़ाई में शामिल होने के लिए बेचैन हो गए। मगर परिवार की ज़िम्मेदारी उनके ऊपर थी। 15-20 दिन तक काफ़ी सोचने समझने के बाद अपने बड़े भाई महेंद्र प्रसाद और पत्नी राजवंशी देवी को भोजपुरी में पत्र लिखकर देश सेवा करने की अनुमति मांगी।

उनका ख़त को पढ़कर उनके बड़े भाई रोने लगे। वे सोचने लगे कि उनको क्या जवाब दें। बड़े भाई से सहमति मिलने पर ही राजेंद्र प्रसाद स्वतंत्रता आंदोलन में उतरे।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद का जन्म 3 दिसंबर, 1884 को को बिहार के भोजपुर क्षेत्र में जीरादेई नाम के गाँव में हुआ था जो अब सिवान ज़िले में है। 13 साल की उम्र में राजेंद्र प्रसाद का विवाह राजवंशी देवी से हो गया। इस समय वे स्कूल में पढ़ रहे थे।

राजेंद्र बाबू के पिता महादेव सहाय फारसी और संस्कृत दोनों ही भाषाओं के विद्वान थे, जबकि उनकी माता कमलेश्वरी देवी एक धार्मिक महिला थीं। वह अपने बेटों को रामायण की कहानियां सुनाया करती थीं। उस समय शिक्षा की शुरुआत फारसी से की जाती थी। प्रसाद जब पांच वर्ष के हुए, तब माता-पिता ने उन्हें फारसी सिखाने की जिम्मेदारी एक मौलवी को दी।

वर्ष 1902 में कोलकाता विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में उन्होंने पहला स्थान प्राप्त किया। इस उपलब्धि पर उन्हें 30 रुपये प्रतिमाह की छात्रवृत्ति से पुरस्कृत भी किया गया था। सन् 1915 में राजेंद्र बाबू ने कानून में मास्टर की डिग्री विशिष्टता के साथ हासिल की और इसके लिए उन्हें स्वर्ण पदक मिला था। कानून में ही उन्होंने डाक्टरेट भी किया।

राजेंद्र तेजस्वी वह एक महान विद्वान थे। इस बात को उनकी उत्तरपुस्तिका पर लिखी परीक्षक की टिप्पणी, परीक्षक की तुलना में परीक्षार्थी बेहतर है बखूबी प्रमाणित करती है। कानून की पढ़ाई से अधिवक्ता प्रसाद भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए और बिहार प्रदेश के एक बड़े नेता के रूप में उभरे।

राजेंद्र प्रसाद गांधीजी के मुख्य शिष्यों में से एक थे और उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के समर्थक प्रसाद को ब्रिटिश प्रशासन ने 1931 के नमक सत्याग्रह और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जेल में डाल दिया था।

1950 में जब भारत गणतंत्र बना तो प्रसाद को संविधान सभा द्वारा इसका प्रथम राष्ट्रपति बनाया गया। बतौर महामहिम प्रसाद ने गैर-पक्षपात और पदधारी से मुक्ति की परंपरा स्थापित की।

आजादी से पूर्व, 2 दिसंबर 1946 को वह अंतरिम सरकार में खाद्य एवं कृषि मंत्री बने और आजादी के बाद 26 जनवरी 1950 को भारत को गणतंत्र राष्ट्र का दर्जा मिलने के साथ राजेंद्र बाबू देश के प्रथम राष्ट्रपति बने। वर्ष 1957 में वह दोबारा राष्ट्रपति चुने गए। इस तरह प्रेसीडेंसी के लिए दो बार चुने जाने वाले वह एकमात्र शख्सियत थे।

राजेंद्र प्रसाद दमा के मरीज़ थे। दमा उनकी मां को भी था। जुलाई 1961 में राजेंद्र प्रसाद गंभीर रूप से बीमार पड़े थे। डॉक्टरों ने कहा कि अब वह नहीं बचेंगे। मगर अगस्त 1961 को भयंकर बीमारी के बाद वे ठीक हो गए। राष्ट्रपति का कार्यकाल पूरा होने के बाद वे पटना आए थे।

उस समय उनको मात्र 1100 रुपये पेंशन मिलती थी। पटना के सदाक़त आश्रम में सेवानिवृत्त होने के बाद अपना जीवन गुज़ारा और 28 फरवरी, 1963 को यहीं उनकी मृत्यु भी हुई।

राष्ट्रपति भवन में जब कभी विदेशी अतिथि आते तो उनके स्वागत में उनकी आरती की जाती थी और राजेंद्र बाबू चाहते थे कि विदेशी मेहमानों को भारत की संस्कृति की झलक दिखाई जाए।