जहां अदीब-दानिश्वर आया करते थे, अब वहां जानवरों की शरणगाह है

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पटना: बिहार की राजधानी पटना के गांधी सरोवर मंगल तालाब के नज़दीक स्थित ‘कुतुबख़ाना अंजुमन तरक़्क़ी उर्दू’ लाइब्रेरी आज संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। इस लाइब्रेरी कभी देश व दुनिया के अदीब-दानिश्वर आया करते थे पर हालात अब यह है कि यहां अब जानवर बंधे मिलते है। यह लाइब्रेरी अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है।

जो अहाता कभी अदब से रोशन था वो अब गायों, भैंसों और सूअरों की शरणगाह में तब्दील हो गया है। चोर-उचक्कों और शराबियों-जुआरियों ने भी इसे अपना अड्डा बना लिया है। किताबों क्या, इस लाइब्रेरी के दरवाज़े-खिड़कियां तक ग़ायब हो गए हैं।

27 मार्च 1939 को स्थापित इस लाइब्रेरी का उद्घाटन कांग्रेस की एक बड़ी नेता सरोजनी नायडू ने किया था।

इसके संस्थापकों में स्वतंत्रता सेनानी ख़ान बहादुर इब्राहिम हुसैन, जस्टिस अख़्तर हुसैन, अज़ीमाबाद (पटना का पुराना नाम) के मशहूर लेखक नवाब रईस व ‘सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है’ जैसी मशहूर नज़्म लिखने वाले मोहम्द हसन उर्फ़ बिस्मिल अज़ीमाबादी शामिल थे।

हालांकि आमतौर पर इस नज़्म के रचनाकार के तौर पर रामप्रसाद बिस्मिल का नाम भी लिया जाता है। इस मामले में ख़ुद इतिहासकारों की राय अलग-अलग है।
आज़ादी से पहले ये लाइब्रेरी बुद्धिजीवियों, लेखकों, साहित्यकारों और स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल लोगों की वैचारिक बहसों का केंद्र हुआ करती थी।

बिस्मिल अज़ीमाबादी के पोते मनव्वर हसन लाइब्रेरी के पुराने दिनों को याद करते हुए बताते हैं, “इस लाइब्रेरी में उर्दू, फ़ारसी, अरबी व पाली भाषा की दस हज़ार से अधिक किताबें थी. कई भोजपत्र व पांडुलिपियां भी मौजूद थीं। उस समय के तमाम मशहूर अख़बार व रिसाले जैसे सर्च लाईट, इंडियन नेशन, आर्यावर्त, सदा-ए-आम, संगम, शमा, फूल इस लाइब्रेरी में आते थे। दूर-दूर से लोग यहां पढ़ने आते थे। इब्ने सफ़ी की सभी सिरिज़ इस लाइब्रेरी में मौजूद थी.”

पटना स्थित जाने माने इतिहासकार प्रोफ़ेसर इम्तियाज़ अहमद भी बताते हैं कि वो 1960 के दशक में ख़ुद लाइब्रेरी जाते रहे हैं।

उस समय ये पटना की काफ़ी अहम लाइब्रेरी थी। सिर्फ़ भारत ही नहीं, बल्कि अमरीका, फ्रांस, जर्मन, ईरान, रूस, यूरोप, मध्य पूर्व, पाकिस्तान व अन्य कई देशों की किताबें भी यहां मौजूद थीं।

हालांकि मनव्वर हसन से मिला एक पत्र, जिसे पांच जून, 1977 को इस लाइब्रेरी के उस समय के सचिव मज़हर इक़बाल ने उर्दू अदब से हमदर्दी रखने वालों को लिखा था, बताता है कि 1962 के बाद इस लाइब्रेरी की हालत ख़राब होने लगी।

1976 के आते-आते इसकी हालत इतनी ख़राब हो गई कि उस दौर में इस लाइब्रेरी के अध्यक्ष व सचिव ने अपने बदनामी के डर से इस लाइब्रेरी में ताला लगा देना ज़्यादा बेहतर समझा। उस समय के उर्दू दैनिक ‘सदा-ए-आम’ व ‘पिंदार’ ने इसके लिए एक मुहिम भी चलाई थी।

पूरी तरह ख़त्म हो चुकी इस लाइब्रेरी को एक बार फिर से ज़िंदा करने की नीयत से अगस्त 2013 में ‘उर्दू लाईब्रेरी एक्शन कमिटी’ बनाई गई। इस कमेटी के संरक्षक बिहार सरकार के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री नौशाद आलम थे। कमेटी के अध्यक्ष समाजसेवी आदिल हसन आज़ाद थे।

आदिल बताते हैं, “लाइब्रेरी को कभी सरकार से मदद तो मिली नहीं, उल्टे बिजली ज़रूर काट दी गई. बाद में इलाक़े के कुछ नौजवानों ने इसका एक कमरा तोड़कर अपने लिए जिम बना लिया। बस यहीं से बर्बादी की दास्तान अपने चरम पर पहुंच गई. हालांकि सरकार इस लाइब्रेरी को चुनाव के समय वोटिंग केन्द्र के तौर पर इस्तेमाल ज़रूर करती है।”

कमेटी के सचिव अबरार अहमद बताते हैं, “1993 से लाइब्रेरी से किताबें ग़ायब होनी शुरू हो गई थी। कई अहम किताबों को इलाक़े के कुछ असामाजिक तत्वों ने निकाल कर सामने के मंगल तालाब में फेंक दिया था। उससे पहले सैकड़ों किताबों को लाइब्रेरी से ग़ायब करके रद्दी के भाव बेच दिया गया। 2002 तक इस लाइब्रेरी से सबकुछ ग़ायब हो चुका था।”

स्थानीय लोगों का आरोप है कि सरकार की उदासीनता ने इस अहम लाइब्रेरी को ख़त्म कर दिया।

हालांकि राजनेता यहां समय-समय पर आकर इसे फिर से आबाद करने के वादे करते रहे हैं। बिहार के पूर्व पर्यटन मंत्री डॉक्टर जावेद इक़बाल अंसारी ने इसके पुनर्निमार्ण के लिए तीन करोड़ देने का ऐलान भी किया था। साथ ही यह भी कहा था कि ज़रूरत पड़ने पर दस करोड़ तक आवंटित किया जा सकता है। इन वादों के बावजूद लाइब्रेरी में कोई काम शुरू नहीं हुआ है।

#अफरोज आलम साहिल