जिलाधिकारी ने कहा, महिला के इच्छा के विरूद्ध इन्टरनेट, ई-मेल या इलेक्ट्राॅनिक माध्यम से बार-बार सम्पर्क करना अपराध है

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पटना – जिलाधिकारी कुमार रवि ने बताया कि महिलाओं एवं बच्चियों का कानूनी संरक्षण प्राप्त है। बलात्कार के मामले में पीड़ित अपने सुविधानुसार किसी भी थाने में जीरो एफआईआर दर्ज करा सकते हैं।3,00,000/-रुपये की राशि मुआवजा के रूप में प्रदान की जाएगी।

जिलाधिकारी ने बताया कि महिलाएं एवं बच्चियां आपराधिक विधि (संशोधन) अधिनियम, 2013 एवं 2018 के अनुसार बलात्कार में धारा-376, जधन्य बलात्संग में (376A) 12 साल से कम पीड़िता के मामले में (376AB), पति से अलग रह रही पत्नी के साथ सम्बन्ध बनाने में (376B) प्राधिकार के द्वारा बलात्कार किये जाने पर (376C) सामूहिक बलात्कार में (376D) (पीड़िता के 16 साल से कम आयु रहने पर (376DA) पीड़िता के 12 साल से कम आयु रहने पर 376DB) में प्राथमिकी दर्ज करा सकती हैं।

बलात्कार के मामले में 02 माह के अन्दर अनुसंधान पूर्ण करना, बलात्कार के मामले में 02 माह के अन्दर विचारण पूर्ण करना, 06 माह के अन्दर अपील के मामले को पूर्ण करना, नियमित जमानत के आवेदन पर सुनवाई के क्रम में वादी की उपस्थिति माननीय न्यायालय में कर सकतीं हैं।

बलात्कार के मामले में न्यूनतम सजा 10 साल एवं अधिकतम सजा मृत्युदंड है। पीड़िता का पहचान का प्रकटीकरण मीडिया या अन्य माध्यम से नहीं किया जाएगा। पीडिता का प्राथमिकी उपचार निःशुल्क की जाएगी। पीड़ित के अवयस्क रहने की स्थिति में पाॅस्को अधिनियम की धाराएं को प्राथमिकी में समावेश किया जायेगा।

जिलाधिकारी ने बताया कि यदि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जन जाति की महिला के साथ बलात्कार होती है तो पीड़ित को 5 लाख रुपये संदाय निम्नानुसार किया जाएगाः-

(i) चिकित्सा जाॅच और चिकित्सा रिपोर्ट की पुष्टि के पश्चात 50 प्रतिशत।

(ii) 25 प्रतिशत जब आरोप पत्र न्यायालय में भेजा जायेगा।

(iii) न्यायालय द्वारा विचारण की समाप्ति पर अभियुक्तों को सजा होने पर 25 प्रतिशत।

यदि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की महिला के साथ सामूहिक बलात्कार होता है तो पीड़ित को 8 लाख 25 हजार रुपये संदाय निम्नानुसार किया जाएगा-

(i) चिकित्सा जाॅच और चिकित्सा रिपोर्ट की पुष्टि के पश्चात 50 प्रतिशत।

(ii) 25 प्रतिशत जब आरोप पत्र न्यायालय को भेजा जायेगा।

(iii) न्यायालय द्वारा विचारण की समाप्ति पर अभियुक्तों को सजा होने पर 25 प्रतिशत।

जिलाधिकारी ने बताया कि छेड़खानी के मामले में स्त्री के इच्छा के विरूद्ध अश्लील साहित्य दिखाना/अश्लील छीटाकसी करना/यौन स्वीकृति की मांग करना (धारा-354A भा0 द0वि0), महिला को निर्वस्त्र करने हेतु हमला करना (धारा-354B भा0द0वि0), महिला को उस स्थान से देखना या चित्र खींचना जहाॅ से देखना उचित नहीं है (धारा-354C भा0द0वि0), महिला के इच्छा के विरूद्ध इन्टरनेट, ई-मेल या इलेक्ट्राॅनिक माध्यम से बार-बार सम्पर्क करना (धारा-354D भा0द0वि0) में अपराध है। छेड़खानी के मामले में मुआवजा देय है।

उन्होंने कहा कि घरेलू हिंसा के मामले में यदि किसी बच्चे या बच्चियों के अभिभावक के द्वारा इच्छा रहने के बावजूद भी पढ़ने नहीं दिया जाना/इच्छा के विरूद्ध शादी/विवाह कराया जाना/मारपीट करना/किसी महिला के मायका या ससुराल पक्षों द्वारा मानसिक या शारीरिक प्रताड़ना दिये जाने की स्थिति में पीड़ित घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत संरक्षण पदाधिकारी सेवा प्रदाता/मजिस्ट्रेट के पास शिकायत दर्ज करा सकतीं हैं।

उन्होंने बताया कि प्रत्येक जिलों में संरक्षण पदाधिकारी के परियोजना प्रबंधक को अधिकृत किया गया है। मजिस्ट्रेट के द्वारा पीड़ित की आवश्यकता के अनुसार वित्तीय सहायता, आश्रय की व्यवस्था आदि संरक्षण आदेश देने का प्रावधान है। ससुराल से प्रताड़ना महिला घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के अतिरिक्त धारा-498ए भा0द0वि0 में भी मामला दर्ज करा सकती है।

जिलाधिकारी ने बताया कि बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 के अनुसार 21 वर्ष से कम उम्र के बालक तथा 18 वर्ष से कम उम्र के बालिका के विवाह को बाल विवाह माना गया है। बाल-विवाह तय करने वाले दोनों पक्षों के व्यक्तियों को दोषी माना गया है। बाल-विवाह प्रतिषेध पदाधिकारी राज्य सरकार द्वारा अनुमंडल पदाधिकारी को घोषित किया गया है।

बाल-विवाह का अनुष्ठान आयोजित होने के संबंध में सूचना किसी व्यक्ति के द्वारा मौखिक या लिखित रूप में डाक/इलेक्ट्रोनिक माध्यम से बाल-विवाह प्रतिषेध पदाधिकारी/प्रखंड पदाधिकारी/थानाध्यक्ष/सरपंच को दी जा सकती है। राज्य विधिक सेवा प्राधिकार के द्वारा व्यक्ति बच्चों को कानूनी सहायता प्रदान किया जाता है।