तरबूज की अच्छी खेती से किसानों में खुशी की लहर

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मुकेश कुमार सिंह

सहरसा – बिहार के कोसी नदी के किनारे दशकों से बेकार और बंजर पड़ी सैकड़ों एकड़ जमीन पर इन दिनों तरबूज की अच्छी खेती हो रही है, साथ ही साथ सैकड़ों लोगों को रोजगार मिल रहा है। बिहार के सहरसा जिले के महिषी प्रखंड के बलुवाहा गाँव के करीब से कोसी नदी बहती है।

दरअसल, नदी की धार के किनारे की बालू वाली जमीन यूं ही बेकार पड़ी थी, बाढ़ और कटाव के भय से यहां के किसान इस जमीन पर खेती करने से हिचकते थे। चार साल पहले यूपी के निवासी आरिफ और कुछ किसान सहरसा आए। वह यहां रहकर कपड़े फेरी लगाते थे, इनलोगों की नज़र लंबे चौड़े क्षेत्र में फैले इस बालू वाली जमीन पर पड़ी। उसने जमीन के मालिक से बात की और कर्ज लेकर प्रयोग के तौर पर करीब चार एकड़ में तरबूज की खेती शुरू की। इस खेती से यूपी के किसानों को अच्छा मुनाफा हुआ।

धीरे-धीरे हर साल अपनी खेती का दायरा बढ़ाते चले गए। इस वर्ष चौथे साल यूपी के किसान ने अपने इलाके से पचास किसानों को लाकर उनकी मदद से पाँच सौ एकड़ में तरबूज उपजा रहे है,किसान आरिफ बताते है पाँच महीने में तैयार हो जाने वाले इस फसल के लिए एक एकड़ में लगभग तीस हजार रुपए की लागत आती है।

उस एक एकड़ के फल की बिक्री से पंद्रह से बीस हज़ार रुपए का फायदा होता है। यूपी के किसान की यह तरकीब गाँव में अच्छा असर दिखाने लगी है। अब गाँव के लोग भी आरिफ से जुड़कर तरबूज की खेती कर रहे है। तैयार तरबूज बिहार के कई जिले सहित नेपाल और पश्चिम बंगाल तक के कारोबारी आकर यहां से बिक्री के लिए ले जाते है। ये सभी किसान आखरी दिसंबर से आकर जून खत्म होते ही चले जाते है।

वाक़ई गीतों के माध्यम से सही ही कहा गया है, मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती, मेरे देश की धरती यह बात सिर्फ गीतों तक ही सीमित नहीं है। बिहार की बंजर जमीन भी शानदार पैदावार के लिए प्रसिद्ध है। कोसी की धरती पर बंजर पड़ी जमीन से मिठास की पैदावार होना इस गीत को सही साबित करता है।