तारीफ़ से ये अपमान अच्छा

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अच्छा हुआ कि शहाबुद्दीन ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तारीफ़ नहीं कि वरना लोग यही समझते कि नीतीश ने ही शहाबुद्दीन को जेल से छूटने में मदद की। चालीस अपराधिक मुकदमों के सरताज़ अगर किसी दूसरे नेता की तारीफ करें तो उसे यही माना जाएगा कि ये सर्टिफिकेट आगे की राजनीति के लिए घातक साबित हो सकता है। हालांकि आरोप अब भी लग रहा है कि नीतीश ने कानूनी पहलू पर ध्यान देने में ढिलाई की जिस वजह से शहाबुद्दीन को बेल मिलना आसान हो गया। पर इसमें भी एक पेंच है। अगर शहाबुद्दीन को मिली बेल के आदेश पर एक नज़र डालें तो उसमें ये साफ़ है कि जिस तेज़ाब हत्याकांड में उनको बेल मिला है उसे कुछ महीने पहले सिर्फ इसलिए रिजेक्ट कर दिया गया था क्यूंकि अदालत को शहाबुद्दीन के खिलाफ गंभीर आरोप में सच्चाई लगी थी। उसी आदेश में ट्रायल कोर्ट को ये निर्देश दिया गया था कि नौ महीने के अन्दर ट्रायल शुरु करें पर निचली अदालत में शहाबुद्दीन के खिलाफ ट्रायल शुरु नहीं हुआ और इसी बीच नौ महीने पूरे होने से पहले ही जमानत मिल गई। सवाल ये उठता है कि आखिर जमानत देने की जल्दबाजी क्या थी और दूसरी तरफ सरकार का रवैया शहाबुद्दीन के तरफ इतना नरम क्यूं? क्या सरकार वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए ट्रायल शुरु नहीं करा सकती थी? सरकार ने सात महीने में शहाबुद्दीन के खिलाफ ट्रायक शुरू कराने में दिलचस्पी क्यूं नहीं ली?

नीतीश के कैबिनेट मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह ने सरकार का बचाव करते हुए कहा कि कानूनी प्रक्रिया है, कई बातें सामने आती रहती हैं जिनका निराकरण होते रहता है। वहीं मंत्री बीजेन्द्र यादव ने कहा कि कानून अपना काम करेगा। एक बात तो तय है कि कानून ने अपना काम नहीं किया चाहे वो सरकार की अनदेखी से या फिर कानूनी दांवपेंच से। सीवान के बाहुबली और लालू के चहेते शहाबुद्दीन फिल्हाल जमानत पर हैं और देश की राजनीति में एक सवाल खड़ा हो गया है कि क्या नीतीश अपनी साख बचाने के लिए कोई फ़ौरी कदम उठाएंगे? या फिर अपने ही अंदाज़ में शहाबुद्दीन और उनके नेता लालू यादव को वक्त आने पर करारा जवाब देंगे।