तो यह है दरभंगा की पहचान

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दरभंगा: अपने गौरवशाली अतीत एवं अदीतीय संस्कृतिक परंपराओं के बावजूद दुर्भाग्य से मिथिला संस्कृति का केंद्र रहा दरभंगा क्षेत्र आज राजनैतिक उपेक्षा का शिकार होकर रह गया है और अब कभी कभी अपनी बाढ़ की भयावहता के कारण अखबारों की सुर्खियों में दिख जाता है।

दरभंगा के महाराजाओं को कला, साहित्य एवं संस्कृति के संरक्षकों में गिना जाता है। स्वर्गीय महेश ठाकुर दूारा स्थापित दरभंगा राज किला-परिसर अब एक आधुनिक स्थल एवं शिक्षा का केंद्र बन चुका है।

भव्य एवं योजनाबद्ध तरीके से अभिकल्पित महलों, मंदिरों एवं पुराने प्रतीकों को अब भी देखा जा सकता है। अलग-अलग महाराजाओं दूारा बनवाए गए महलों में नरगौना महल, आनंदबाग महल एवं बेला महल प्रमुख है।

राज पुस्तकालय भवन ललितनारायण मिथिला विश्वविद्यालय दूारा एवं अन्य कई भवन संस्कृत विश्वविद्यालय दूारा उपयोग में लाए जा रहे है।

हजरत मखदूम भीका शाह सैलानी का मजार :

दरगाह शरीफ हजरत मखदूम भीका शाह सैलानी रहमतुल्लाह अलैह बिहार के दरभंगा शहर के रेलवे स्टेशन से आधा किलोमीटर की दूरी पर दिघी तालाब के पश्चिम किनारे पर मोहल्ला मिश्रटोला में स्टेशन रोड पर हजरत मखदूम भीका शाह सैलानी रहमतुल्लाह अलैह का मजार है।

सड़क के ऊंचाई पर स्थित आलिशान दरगाह शरीफ में हजरत मखदूम भीका शाह सैलानी रहमतुल्लाह अलैह का तकरीबन 400 वर्ष से पुराना मजार है। दरगाह परिसर में ही हजरत मौलाना फिदा अब्दुल करीम समरकंदी रहमतुल्लाह अलैह का भी मजार है जो बाद में आए थे।

हजरत मखदूम भीका शाह सैलानी रहमतुल्लाह अलैह का सालाना उर्स ईद उल जुहा की 13 से 17 तारिख तक होता है। जिसमें बिहार के अलावा अन्य राज्यों से और पडोसी देश नेपाल के भी जायरीन आते है। हजरत मखदूम भीका शाह सैलानी रहमतुल्लाह अलैह को मानने वाले हिंदू मुस्लिम, सिख ईसाई सभी मजहब के लोग है।