दानापुर छावनी और स्वाधीनता संग्राम

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पटना: दानापुर छावनी में प्रथम स्वाधीनता संग्राम का प्रारम्भ सिपाहियों के विद्रोह के रुप में 25 जुलाई 1857 को हुआ। तब ईस्ट इंडिया कंपनी की बंगाल फौज स्वेज नहर के पूर्व सबसे बड़ी सैनिक टुकड़ी थी। बंगाल फौज की सबसे बड़ी टुकड़ी मेरठ में थी। यही सबसे पहले 10 मई 1857 को विद्रोह में उठ खड़ी हुई थी। दानापुर छावनी के सिपाही ब्रिटिश हुक्कामों के खिलाफ सबसे आखिर में विद्रोही हुए थे।

पटना के तत्कालीन कमिश्नर विलियम टेलर ने दानापुर छावनी मे खतरे को भांप लिया और कमांडेंट जरनल लांयड के सिपाहियो से हथियार के लेने को कहा। लेकिन जरनल इतना बड़ा कदम उठाने से हिचक रहे थे। 24 जुलाई 1857 को लाँयड ने बीच का रास्ता अपनाया। थोड़े बल प्रयोग से वे सिपाहियों को अपमानित किये बिना उनसे मैग्जिन की कैंप मांगने मे सफल रहे। स्वयं को सफल मानकर बैरकों में यूरोपीय सैनिक भेज दिए और अपने अफसरों को सिपाहियों से कैप इखट्ठा करने का आसान कार्य देकर वहां से चले आए।

आरा बैरक में तैनात तीनों देशी इन्फैन्ट्री रेजिमेंटों ने कैप देने से इनकार कर दिया और 25 जुलाई 1857 को यूरोपियनों के खिलाफ हथियार उठा लिए।‘यूरोपियन अस्पताल’ के पहरेदारों ने अफसरों को भागते देखा और सिग्नल बंदूके दाग दीं। यूरोपियन मरीज छत पर चढ़ गए और बंदूके चलाई जिसमें करीब दर्जन भर सिपाही मारे गए। शुरुआत में ज्यादा सिपाही लड़ाई मे शामिल नहीं हुए थे। लेकिन इस हमले की खबर सुनकर सभी इसमे शामिल हो गए। इसके बाद उत्पन्न अराजकता में सिपाही आरा (तत्कालीन शाहाबाद जिले का मुख्यालय) की ओर चल पड़े, क्योंकि उनमें से अधिकांश इसी क्षेत्र के थे।

अपने विशाल प्रांगण में आरा बैरक आज भी खड़ा है। भारतीय सेना के बिहार, झांरखंड, उड़ीसा सब एरिया का मुख्यालय इसी के एक भाग मे है। यहां के दोनो चर्च और अस्पताल की इमारत 1857 के संघर्ष की साक्षी हैं।