दीवार पर क्या लिखा है ?

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2010 चुनाव के ठीक पहले बिहार विधानसभा में तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद यादव पर कटाक्ष करते हुए कहा था — दीवार की लिखावट को पहचानिए। आत्मविश्वास से लबरेज नीतीश के ये बोल सौ फीसदी सच साबित हुए। वो वक्त ऐसा था जब जो नीतीश कहते थे वही होता था। उनकी बात पत्थर की लकीर मानी जाती थी। राजनीतिक पंडित कहा करते थे कि नीतीश जनता की नब्ज़ पहचानते हैं। आज के चाणक्य भी, और चन्द्रगुप्त भी वहीं हैं। नीतीश कोई भी फैसला चुटकी बजाते लेते थे। बिहार ही नहीं, देश-विदेश में इसका डंका पिटता था।

नीतीश ने इस ताकत को शायद समझने में भूल कर दी। यह ताकत उनके अकेले की नहीं थी बल्कि साझेदार, हमसफर और विश्वासी दोस्त बीजेपी की वजह से थी। पूरा देश नरेन्द्र मोदी के गुणगान और केन्द्र की सत्ता बदलने की छटपटाहट में फैसला ले चुका था पर नीतीश के आस-पास रहने वाले सिपहसलार और कुछ नौकरशाह उन्हें प्रधानमंत्री बना रहे थे। यहां तक कि चुनावी नतीजे के एक रात पहले तक 40 में से 26 सीट मिलने का सपना दिखा रहे थे।

एक उनके बेहद करीबी ब्यूरोक्रेट ने बताया कि एक अधिकारी ने अठारह सीट आने की बात कही तो नीतीश किस तरह बिफर पड़े। कहा – एसी कमरे में बैठे हैं, जमीन पर कभी गए नहीं, टीवी देखकर ज्ञान दे रहे हैं। वो बेचारा अधिकारी अपमानित होकर चुप रह गया।

लेकिन जब नतीजे आए तो ऐसा लगा जैसे सपनों की दुनिया से अचानक जाग गए हों। आखिर ऐसी क्या बात हुई कि नीतीश जनता की नब्ज़ को पकड़ नहीं पाए ? राजनीति में फैसला – सही या गलत – क्या होता है, ये वक्त बताता है लेकिन कई बार वक्त के हिसाब से भी फैसले लेने पड़ते हैं। नीतीश यहीं चूक गए। हैरानी की बात तो ये है कि नीतीश उस तोते की तरह एक ही बात रटते रहे जिसे बहेलिये और जाल बिछाने की कहानी तो याद रही लेकिन वो जाल में खुद फंसता रहा और कहानी कहता रहा।

नीतीश ने कहा था कि चाहे कुछ हो जाए लालू से कभी समझौता नहीं करेंगे। लेकिन आज वक्त और हालात को देखते हुए उन्हें उसी लालू से समझौता करना पड़ गया जिसका डर दिखाकर मुख्यमंत्री बने रहे।

नीतीश ने बीजेपी से सम्बन्ध तोड़ने के बाद ही मान लिया था कि वो मिट्टी में मिल जाएंगे लेकिन बीजेपी से समझौता नहीं करेंगे। आज आलम यह है कि करीब बीस साल पहले जिस व्यक्ति से मरते दम तक समझौता नहीं करने की कसम खाते थे, आज उन्हीं के साथ मंच पर बात-बात पर समझौता करते दिखते हैं। कल तक लालू नीतीश की न सिर्फ खिल्ली उड़ाते थे बल्कि उन्हें दिल से कोसते भी थे। ताज्जुब की बात ये है कि लालू मंच से ही नीतीश की खिल्ली उड़ाते हैं और नीतीश उनकी बातों पर ठहाका लगाते हैं। लालू ने तो एक सभा में ये तक कह डाला कि हमारा छोटा भाई है, आकर पैर में बैठ गया, तो क्या करें, उठाकर पटक दें?

दस सीटों पर हो रहे उपचुनाव के नतीजे 25 तारीख को आएंगे। नतीजे कुछ भी कहें लेकिन जनता नीतीश के एक के बाद एक लिए फैसले को गौर से देख रही है और वह अपना फैसला 2015 के चुनाव में सुनाएगी।