देहातीपन की मार्मिकता का अदभुत संयोग है बिदेसिया

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लोक कलाकार भिखारी ठाकुर बिदेसिया के प्रवर्त्तक थे। मिदनापुर में रामलीला देखकर वे इतने प्रभावित हुए कि अपने गांव कुतुबपुर पहुंच कर रामलीला मंच की स्थापना कर डाली। बंगाल की यात्रा से वे बड़े प्रभावित हुए। फिर सोच समझ कर उन्होंने अपनी भाषा भोजपुरी में बिदेसिया नाटक मंडली चलाई, जो घुम -घुम कर प्रदर्शन करती थी। बिदेशिया नाटक का जहां भी मंचन होता है, दूर दूर से स्त्री -पुरुष और बच्चे-बूढ़े हजारों की संख्या में उनका नाटक देखने को पहुंचते थे। नाटक के मंचन में संगीत महत्वपूर्ण था और संवाद भोजपुरी में।

हास्य, करुणा और श्रृंगार रस की वर्षा होती थी। लोक प्रचलित गीतों का भिखारी ठाकुर ने अपने नाटकों में एक ऐसे कथानक में पिरोया, जिसमें पश्चिम बिहार के ग्रामीण जीवन के यथार्थ और मेघदूत से आधुनिक युग तक प्रवाहित विरहिणी नायिका और प्रेमियों के संदेशवाहक दूतों की परंपरा का अदभुत मिश्रण है। ठेठ देहातीपन और कहीं-कहीं अश्लीलता के साथ उत्कृष्ठ मार्मिकता का अदभुत संयोग है।

भोजपुर क्षेत्र के लोग आजीविका की खातिर पूर्व देश यानी कोलकाता जाया करते थे। उस शहर के मायाजाल में फंसकर अफनी ब्याहता पत्नी, माता-पिता, जन्मभूमि सबको भूल जाते थे। शहर की रमणियों में मन बहलाते थे। इधर घर के लोग हमेशा उसके आने की प्रतिक्षा करते थे, लेकिन निराशा हाथ लगती।

बिदेसिया में परदेशी शब्द का अर्थ पति के रुप में आया है, वह पति जो परदेश चला गया। विरहिणी पत्नी रोती-बिखलती है और बटोही दूारा अपना मार्मिक संदेश पति तक भेजवाती है। परदेशी वेश्या के प्रेमजाल में बंधा है। उससे बच्चे हुए है। लेकिन अंतत: वह भी बंधनो को तोड़कर वापस घऱ चला जाता है। विरह, सुख में परिवर्तित हो जाता है। इस तरह बिदेसिया नाटक विरहिणी के विरह का नाटक है।

लोक कलाकार भिखारी ठाकुर को मनुष्य जीवन और अनुभूति का गहरा अनुभव था। इनके नाटकों में न केवल विरहिणी का उच्छवास है, बल्कि समाज की कुरीतियों का भंडाभोड़ भी है।