दो बहनों का सरकार से सवाल, आखिर मेरा कसूर क्या है !

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दरभंगा: यमन में अलकायदा और आईएसआईएस जैसे आतंकवादी के डर से जान बचाकर दो सगी बहनें मनीषा और लूसी यमन के मेडिकल कॉलेज में फाइनल इयर की पढ़ाई छोड़ अपने वतन भारत लौट आई हैं। पर अपना भविष्य अंधकार की ओर जाता देख पूरा परिवार अब मानसिक परेशानी से गुजर रहा है।

यमन में 2015 को युद्ध जैसे हालात हो गए तो दोनों बहनों को जान बचाकर डॉक्टर की पढ़ाई बीच में ही छोड़कर वापस लौटना पड़ा, लेकिन डेढ़ साल से ज्यादा बीतने के बाद भी दोनों बहनों को अब तक हिंदुस्तान के किसी मेडिकल कॉलेज में दाखिला नहीं मिल सका है।

एमसीआई के नियम और कानूनी दांवपेंच के बीच अपना भविष्य अंधकार की ओर जाता देखा पूरा परिवार अब मानसिक परेशानी से गुजर रहा है. देश की बेटी पढ़ाई के लिए अपने देश में ही दर-दर की ठोकरें खा रही है.

दरसल दरभंगा की रहने मनीषा और लूसी दोनों बहनें डॉक्टर बनने का सपना लेकर यमन के मेडिकल कॉलेज में फाइनल इयर की पढ़ाई कर ही रही थी, तभी वहां आतंकी संगठन ने ऐसा माहौल पैदा कर दिया कि यमन में युद्ध जैसे हालात हो गए।
मामले की गंभीरता को देखते हुए भारतीय दूतावास ने सभी भारतीयों को यमन छोड़ने का आदेश दिया। जिसके बाद भारतीय दूतावास के निर्देशानुसार आनन फानन में यमन देश को छोड़ बम और गोलियों की तड़तड़ाहट के बीच सभी को अपने वतन भारत लौटना पड़ा। मेडिकल की पढ़ाई को अंतिम पड़ाव में छोड़ दोनों बहनें 2015 में भारत लौट गईं।

लेकिन डेढ़ वर्ष बीतने के बाद भी दोनों बहनों को अब तक हिंदुस्तान के किसी मेडिकल कॉलेज में दाखिला नहीं मिला है। अपने भविष्य को लेकर परेशान दोनों बहने बिहार सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक गुहार लगाई पर कोई फायदा नहीं मिला। थक-हारकर दोनों बहनों ने न्याय के लिए दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया है।

कानूनी दांवपेंच के बीच उलझी मनीषा और लूसी अपनी फरियाद को लेकर नीतीश कुमार के जनता दरबार में पहुंची। फरियाद लगाने के बाद सीएम नीतीश कुमार ने दोनों बहनों को राहत देते हुए बिहार के मेडिकल कॉलेजो में नामांकन के लिए हामी भर दी, लेकिन एमसीआई का सहयोग नहीं मिलने के कारण अब तक दाखिला नहीं मिल पाया है।

ऐसे में केंद्र सरकार और एमसीआई का रवैया परिवार को चिंता में डाल रहा है वो भी तब जब भारत की यह बेटी इंडो- यमन कल्चरल एक्सचेंज के अंतर्गत स्कॉलशिप स्कीम के तहत यमन में पढ़ाई कर रही थी। पूरा परिवार अब जबरदस्त मानसिक परेशानी से गुजर रहा है।

जिस देश में पाकिस्तान से आई एक लड़की को हमारे देश के केंद्रीय मंत्री सुषमा स्वराज ने एक कदम आगे बढ़कर पढ़ने का इंतजाम ही नही किया। बल्कि उसका कॉलेज में नामांकन भी कराया और खूब वाह वाही भी बटोरी थी। लेकिन इसके ठीक विपरीत हमारे ही देश की बेटी पढ़ाई के लिए हिंदुस्तान में ही दर दर की ठोकर खा रही है।

अब सवाल यह है कि जिस देश के प्रधानमंत्री बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा दे उसी देश की बेटी को पढ़ने के लिए संघर्ष करना पड़े तो सरकार के कथनी और करनी में फर्क समझा जा सकता है। पूरी तरह टूट चुकी दोनों बहनें चारों तरफ निराशा के बाद अब मिडिया के सहारे सरकार से फिर से एक बार मदद मांगने के लिए सामने आई है। ताकि उसे न्याय मिले और आगे अपनी पढ़ाई पूरी कर देश को अपनी सेवा दे सके। अपने नम आंखों से सिसकती आवाज़ में बस एक ही सवाल पूछती है आखिर मेरा कसूर क्या है ?