धान फसल में बीजोपचार क्यों और कैसे करे

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पटना: कृषि विभाग ने जानकारी दी है कि खरीफ मौसम में धान की खेती का कार्य कृषक प्रारंभ कर चुके हैं और बड़ी तेजी से बीज स्थली में बीज गिराने का कार्य किया जा रहा है। इस संदर्भ में ध्यातव्य है कि कृषक इस समय खरीफ से संबंधित अपनी तैयारियों में निम्नाकित बिन्दुओ पर अवश्य ध्यान दें। अच्छे उत्पादन के लिए खेत के अनुसार प्रभेद का चुनाव करें ताकि उत्पादन सुनिश्चित हो सके, खेत की ऊँची, नीची और मध्यम स्थिति के अनुसार उस क्षेत्र में लगने वाले कीट/व्याधियों के मद्देनजर धान के उत्पाद एवं प्रतिरोधी प्रभेदों का चयन करें, बीज स्वच्छ, स्वस्थ एवं पुष्ट होना चाहिए जिसमें खरपात के बीज मिले हुए न हों। बीज को फटक कर साफ सुथरा एवं खरपात को बीज से रहित कर लिया जाना चाहिए। बीज की अंकुरण क्षमता 80 प्रतिशत से कम नहीं होनी चाहिए। इसकी जाँच के लिए सौ (100) बीज को अंकुरण के लिए गमला या मिट्टी में डाल देना चाहिए। जितने पौधे उग जाते है, वही बीज की अंकुरण क्षमता होती हैं इसलिए किसान पुष्ट बीज का ही प्रयोग करें। पुष्ट बीज प्राप्त करने के लिए साधरण नमक के 10 प्रतिशत घोल में बीज को डुबाएं, तैर रहे हल्के बीज को अलग कर दें और डूबे बीज को दो-तीन बार सादा साफ पानी से धोकर छाया में सुखा लें। बीजोपचार क्योें- बीज में अंदर एवं बाहर रोगों के रोगाणु सुशुप्त अवस्था में (बीज जनित रोग) मिट्टी में (मिट्टी जनित रोग) एवं हवा में (वायु जनित रोग) मौजूद रहतें हैं। ये अनुकूल वातावरण के मिलने पर अंकुरित होकर पौधों पर रोग के लक्षण के रूप प्रकट होते हैं।

बीजोपचार कैसे– कीट/व्याधि से मुक्त फसल के बीज को स्वस्थ बीज माना जाता है, जोे कि व्यवहार में संभव नहीं है इसलिए किसी भी बीज को मिट्टी में गिराने से पहले अनुशंसित बीजरोधक से बीजोपचार करने की सलाह दी जाती है। उपचारित बीज को स्वस्थ माना जाता है। धान के बीच को कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिषत धु0चू0 या कार्बेडाजिम 12 प्रतिशत़ मैनकोजेब 63 प्रतिषत धु0चू0 का 2 ग्राम प्रति किलो बीज एवं स्ट्रेप्टोसायक्लिन का 1 ग्राम प्रति 10 किलो की दर से बीज में मिलाये।

बीज उपचार की विधियाँ– सीडड्रम में बीज डालकर उसमें बीजोपचार के लिए अनुशंसित शोधक की मात्रा एवं पानी का छींटा देकर उसमें लगे हैंडल के सहारे ड्रम को इतना घुमाया जाता है कि बीज के उपर एक परत चढ़ जाये। आवश्यकतानुसार बीज में पानी के छींटे दिये जा सकते हैं।

घड़ा विधि– घड़ा में थोड़ा बीज एवं उसी अनुपात में शोधक डालते हैं फिर उसी प्रकार थोड़ा-थोड़ा करके घड़े को दो तिहाई भाग भर देते हैं। पानी का छींटा दे कर घड़े के मुँह को बंद कर इतना हिलाते हैं कि बीज और शोधक अच्छी तरह से मिल जाएँ।

स्लरी विधि– इस विधि में शोधक की अनुशंसित मात्रा का गाढ़ा घोल बनाकर बीज के ढेर पर देकर उसे दस्ताना पहने हाथों से अच्छी तरह मिला देते हैं।

घोल विधि– इस विधि में शोधक की अनुशंसित मात्रा का घोल पानी की निर्धारित मात्रा में बनाकर उसमें बीज को नियत समय तक डुबाकर रखा जाता है। धान के बीच को उपचारित करने के लिए बीज को पानी में भिगोकर बाहर निकाल लें, उसके बाद उसमें निर्धारित मात्रा में बीजशोधक मिला दें। अब इस शोधित बीज को जूट के बोरे से कम से कम 24 घंटे तक ढँक कर रखें, ताकि बीज में अंकुरण नजर आने लगे। इसके बाद उसे तैयार खेत में बिखेर दें। ऐसा करने से कम से कम एक सप्ताह पहले स्वस्थ बिचड़ा तैयार हो जाता है। पौधा संरक्षण केन्द्रों पर सीडड्रम (बीज उपचारक-यंत्र) नाममात्र शुल्क पर उपलब्ध है। जिसकी सेवा प्राप्त की जा सकती है। किसान भाइयों एवं बहनों से निवेदन है कि जानकारी एवं सुविधा के लिए नजदीक के पौधा संरक्षण केंन्द्र सहायक निदेशक, पौधा संरक्षण अथवा जिला कृषि पदाधिकारी के कार्यालय एवं कृषि विज्ञान केन्द्र केन्द्र के वैज्ञानिकों से संपर्क करें।