पारम्परिक परंपराओं से जुड़ा है भैया का त्योहार

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दया नन्द तिवारी

भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक भैया दूज का पर्व दीपावली के दो दिन बाद मनाया जाता है। इसे यम द्वितीया भी कहते हैं। भईया दूज पर्व भाईयों के प्रति बहनों की श्रद्धा और विश्वास का पर्व है। इस पर्व को हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि के दिन मनाया जाता है। इस पर्व में यम देव की पूजा की जाती है।

मान्यता है कि यम देव की उपासना करने से उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है। अन्य त्योहारों कि तरह यह त्योहार भी पारम्परिक परंपराओं से जुड़ा हुआ है। इस पर्व पर बहनें अपने भाई को तिलक लगाती हैं तथा भाई को चना खिलाकर उसकी लंबी आयु की कामना करती हैं। बदले में भाई अपनी बहन की रक्षा का वचन देता है साथ ही निश्चित उपहार देने की परम्परा है। इस दिन बहनों के घर पर भाई को बुलाकर भोजन कराना विशेष रूप से शुभ होता है।

मिथिला में इस पर्व को आज भी यमद्वितीया के नाम से जाना जाता है। इस दिन चावलों को पीसकर एक लेप भाईयों के दोनों हाथों में लगाया जाता है। साथ ही कुछ स्थानों में भाई के हाथों में सिंदूर लगाने की भी परंपरा देखी जाती है। साथ ही गाय के गोबर में चना को लकड़ी के ओहली में कूटकर भाई खिलाय जाता है। भाई की आरती उतारते वक्त बहन की थाली में सिंदूर, फूल, चना, चावल के दाने, पान, सुपानी, नारियल, फूल माला और मिठाई होना जरूरी होता है।

भाई दूज के विषय में एक पौराणिक मान्यता है कि यमुना ने इसी दिन अपने भाई यमराज की लंबी आयु के लिए व्रत किया था और उन्हें अन्नकूट का भोजन खिलाया था। कथा के अनुसार यम देवता ने अपनी बहन को इसी दिन दर्शन दिए थे। यम की बहन यमुना अपने भाई से मिलने के लिए अत्यधिक व्याकुल थी। अपने भाई के दर्शन कर यमुना बेहद प्रसन्न हुई। यमुना ने प्रसन्न होकर अपने भाई की बहुत आवभगत की तो यम ने प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया कि इस दिन अगर भाई-बहन दोनों एक साथ यमुना नदी में स्नान करेगें तो उन्हें मुक्ति प्राप्त होगी।

इसी कारण से इस दिन यमुना नदी में भाई-बहन के साथ स्नान करने का बड़ा महत्व भी है। इसके अलावा यम ने यमुना ने अपने भाई से वचन लिया कि आज के दिन हर भाई को अपनी बहन के घर जाना चाहिए। तभी से भाई दूज मनाने की प्रथा चली आ रही है। ऐसे अन्य कई कथा भी है।