प्रसिद्ध ‘सौराठ सभा’ संपन्न, तीन सौ से अधिक विवाह का हुआ पंजीकरण

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मधुबनी: पिछले नौ दिनों से चल रही सौराठ सभा मंगलवार को संपन्न हो गई। अन्तिम दिन भी हजारों की संख्या में लोग पहुंचे। इस अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। सभा में करीब तीन सौ से अधिक विवाह का पंजीकरण किया गया।

मैथिल ब्राह्मणों के वैवाहिक संबंधों के निर्धारण के लिए प्रसिद्ध ‘सौराठ सभा’ में कभी वरागतों-कन्यागतों में शास्त्रार्थ होता था। भावी दूल्हों का चयन उनके ज्ञान और क्षमता की परख के बाद किया जाता था। वर पक्ष के सात पुश्तों की और वधू की पाँच पुश्तों की वंशावली देखी जाता थी और फिर जांच-परख कर विवाह तय किया जाता था।

सन 1326 ई. में मिथिला नरेश हरीसिंह देव ने लिखित रूप से पंजी प्रथा की व्यवस्था की थी और इस प्रथा की नींव रखी थी। इस वर्ष आयोजन समिति, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, चेतना समिति के सचिव उमेश मिश्र अन्य लोगों द्वारा वृक्षारोपण किया गया। वहीं मधुबनी के डीएम शीर्षत कपिल अशोक ने भी सौराठ सभा जाकर वहाँ के व्यस्था का जायजा लिया। डीएम शीर्षत कपिल अशोक उसके बाद सौराठ के म्यूजियम भी गए और उसमें रखे सामानों की सफाई का भी निर्देश दिया। डीएम शीर्षत कपिल अशोक ने सरकारी स्तर पर सहयोग का भी आस्वाशन दिया।

विलुप्त होती जा रही ये परंपरा
लेकिन करीब एक दशक से ये संस्कृति विलुप्त होती जा रही है। आधुनिकता और इस भाग-दौड़ के समय में लोग मिथिलांचल की इस संस्कृति को ही भूलते जा रहे हैं। विवाह के लिए यहां आना अब ‘शान’ नहीं शर्म की बात समझी जाने लगी है।

रक्त संबंध देखा जाता है (जेनेटिक चेन)
यहां माता पक्ष और पिता पक्ष की सात पु्श्तों की वंशावली में ये देखा जाता था कि कहीं इन दोनों पक्षों के बीच पहले कभी रक्त संबंध तो नहीं है, उसके बाद पंजीकार विवाह की अनुमति देते थे। प्रतिवर्ष लाखों लोगों के जमावड़े और सैकड़ो जोड़ियों की आदर्श विवाह के लिए सौराठ सभा विश्वभर में प्रसिद्ध है।

लेकिन इस बार सौराठ सभा में हजारों की संख्या में देश के कोने-कोने से ब्राह्मण लोग पहुंचे और तीन सौ से अधिक शादियां सौराठ सभा में पंजीकृत हुई। 3 जुलाई को नौ दिवसीय सौराठ सभा के समापन के साथ ही मिथिलांचल में शादी-विवाह का मौसम भी समाप्त हो गया।