फिल्म फेस्टिवल में क्यूं परोसा गया अंडररेटेड फिल्म ?

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फ्रांस है सिनेमा का जनक, क्यूं भूल गए लोग ?

बहुत तामझाम से बिहार के अधिवेशन भवन में चल रहे अंतराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में भाग लेने मैं भी अपने स्टूडेन्ट्स के साथ शनिवार को गई थी। कल पहले दिन नहीं जा पाई क्यूंकि कॉलेज में व्यस्तता थी और कार्यक्रम अपने निर्धारित समय से करीब चार घंटे पहले ही खत्म कर दिया गया। बहुत अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है कि फेस्टिवल, जो शनिवार को अपने समय से एक घंटे देरी से शुरु हुआ, में एक ऐसी घटिया फ्रेंच फिल्म दिखाई गई जिसे अगर ‘पॉर्न फिल्म’ की कैटगरी में रखा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। फिल्म में इतना ज्यादा एडल्ट कंटेंट था कि कोई भी इसे देख कर शर्म से पानी-पानी हो जाये। फिल्म का प्रभाव यह था कि कोई भी आपस में एक दूसरे से नजरें तक नहीं मिला पा रहा था।

A Tout De Suite नामक यह फिल्म हर मर्यादा को लांघती है जिसे एक भारतीय और उस पर भी बिहारी बर्दाश्त नहीं कर पाएगा। पर मैंने किया। बहुत देर तक कुछ ऐसे दृश्य आए जिसे देख कर मन हुआ कि कहां छुप जाऊँ। कई बार अपने सीट के बगल में खड़ी वॉलंटियर से मैंने पूछा भी कि फिल्म कितने देर में खत्म होगी और बाहर जाने के लिए कौन सा दरवाजा खोला गया है क्यूंकि शुरु में ही सख्त हिदायत दे दी गई थी कि लोगों को आवाजाही नहीं करनी है और सभी दरवाजे बंद कर दिए गए थे। हॉल में पूरा अंधेरा था। पर वॉलंटियर की फौज सिर्फ सज्जा के लिए थी, उन्हें किसी भी तरह की कोई जानकारी नहीं थी। बदइंतजामी का आलम ये था कि पहले से दर्शकों को फिल्मों की कोई जानकारी नहीं दी गई थी कि किस दिन, किस समय कौन सी फिल्म दिखाई जाएगी और वो कितने देर चलेगी।

साथ में स्टूडेन्ट्स थे इसलिए बार-बार शर्मिंदगी महसूस हो रही थी कि वो क्या सोचेंगे। यह भय भी था कि उनका अपरिपक्व मन इन सभी चीजों को सही तरीके से नहीं समझ पाएगा। कहीं वे दिग्भ्रमित तो नहीं हो जाएंगे? शिक्षक होना बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है इसलिए मैं बेहद परेशान थी। गौर करने वाली बात यह थी कि यह फिल्म सार्वजनिक रूप से दिखायी जा रही थी पर किसी ने भी इस विषय पर कोई विरोध नहीं जताया।

बिहार राज्य फिल्म विकास एवं वित्त निगम लिमिटेड ने हमारे कॉलेज के छात्र-छात्राओं को निमंत्रण दिया था जिस वजह से स्टूडेंट्स (खासकर मास कम्यूनिकेशन विभाग के) वहां उपस्थित थे। चूंकि पाठ्यक्रम में फिल्म स्टडीज एक पूरा पेपर होता है इसलिए हमारी भी कोशिश होती है कि स्टूडेन्टस ऐसे आयोजनों का हिस्सा बनें।

हमारी आशा थी कि इस महोत्सव के माध्यम से सिनेमा से जुड़ी नई बातें सीखेंगे लेकिन जिस तरह की फिल्म का चयन किया गया वह अत्यंत निन्दनीय है। इस फिल्म को फ्रेंच सिनेमा का प्रतिनिधित्व करने के लिए क्यूँ चुना गया यह भी समझ नहीं आया क्यूंकि फिल्म किसी भी पैमाने पर खरी नहीं उतरती। सिनेमैटोग्राफी, कहानी, कास्ट …कुछ भी मन में हलचल पैदा नहीं करता। थोड़ी-थोड़ी देर पर सिर्फ नग्नता परोसी जाती है। कुछेक भद्दे सीन तो इतने लम्बे हैं कि सिनेमा में उनका उपयोग किस लिए किया गया इसे समझने के लिए बहुत बुद्धिमत्ता या फिल्म एक्स्पर्ट होने की जरूरत नहीं है। फिल्म का यूएसपी सिर्फ यही सीन थे। फिर फिल्म कला को समझने का ढोंग करने की जरुरत ही क्या है। अगर इस फिल्म से फ्रांस की संस्कृति से लोगों का परिचय कराया जा रहा है तो भी ये सही नहीं क्यूंकि दर्शकों को गलत संदेश जाएगा। फ्रांस सिनेमा का जनक है, ये हम भूल नहीं सकते। पर आयोजक भूल गए थे। किसी ने भी सिनेमा के इतिहास में फ्रांस की महत्ता पर दो शब्द भी नहीं कहे।

दलील ये कतई नहीं हो सकता कि छात्र-छात्राएं 18 वर्ष से ऊपर के आयु के थे या नहीं, दुर्भाग्यपूर्ण ये है कि सिनेमा के महत्वपूर्ण माध्यम की गम्भीरता को समझा नहीं गया। साथ ही हॉल में कई बच्चे भी थे। फिल्म निगम के एक बड़े अधिकारी तो अपनी छोटी सी बेटी को बैठा कर यह एडल्ट फिल्म दिखा रहे थे। क्या यह गैरकानूनी हरकत नहीं है? फिल्म शुरु होने से पहले उसके बारे में बताया जरुर गया पर यह नहीं कि इसे देखने के लिए आपकी चमड़ी मोटी होनी चाहिए। यह एक एडल्ट फिल्म है इसका बिल्कुल भी जिक्र नहीं किया गया। अगर पहले से आगाह कर दिया जाता तो जिम्मेदारी पूरी तरह से दर्शक पर होती कि उसे फिल्म देखनी है या नहीं। मेरी समझ से ऐसे फिल्मों का चयन इस तरह के फेस्टिवल के लिए कतई सही नहीं है।

बड़े-बड़े होर्डिंग लगाए गए, रेडियो, अखबार में प्रचार हुआ पर क्या फिल्म दिखाने से पहले खुद उसे देखना जरूरी नहीं समझा किसी ने? बिना ब्लर किए हुए नग्नता खुले तौर पर बार-बार परोसी गई। मैं मानती हूं कि फ्रांस और भारत की संस्कृति में ये भेद तो रहेगा ही लेकिन क्या वह फिल्म जब पटना जैसे शहर में दिखाई जा रही है और स्टूडेन्ट्स को निमंत्रण दिया जा रहा है, तो उन घोर आपत्तिजनक दृश्यों को एडिट नहीं किया जा सकता था? क्या बिना किसी तैयारी के यह महोत्सव इतने सारे पैसे खर्च कर किया जा रहा है?

दुख इस बात का है कि समारोह की शुरुआत बिहार के राज्य गीत और फ्रांस के राष्ट्रगीत के साथ हुई जिस दौरान सभी अपनी सीट से खड़े हुए उन गीतों को पूरा सम्मान देते हुए पर पल भर में बिहार के प्रति सम्मान यूं ही धूल-मिट्टी हो गया जब सभी ने शांतिपूर्ण तरीके से फिल्म को देखा। एक भयावह दृश्य (पॉर्न) जब मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ तब मैंने सीट से खड़े होकर फिल्म बन्द करने की अपील की साथ ही इस बात पर अपनी आपत्ति जताई। स्टूडेन्ट्स भी बाहर निकल आए। मैंने उन्हें अगले दिन यानी आज महोत्सव में भाग लेने के लिए मना किया।

इस फिल्म का चयन जिसने भी किया उसे यह तो सोचना चाहिए था कि जो इसमें सम्मिलित होंगे उनकी अपेक्षाएं क्या हैं। घर जाकर जब बच्चे अपने परिजनों को इस कार्यक्रम के बारे में बताएंगे तो उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी। मैंने उन सभी बच्चों से माफी मांगी क्यूंकि मैंने ही उन्हें इस समारोह में भाग लेने की सलाह दी थी। अगर शिक्षक और विद्यार्थी साथ बैठकर ऐसी फिल्में देखें तो उससे बुरा कुछ हो ही नहीं सकता। इस भारी चूक की जितनी निन्दा की जाए वो कम है। कई बार लोग कम समय में बहुत कुछ हासिल कर लेना चाहते हैं बिना किसी बात की परवाह किए। अगर ये आयोजन बिहार की छवि सुधारने के लिए किए जा रहे हैं तो शायद जनता का पैसा पूरे तरह से सिर्फ बर्बाद किया जा रहा है।

डॉ मनीषा प्रकाश