फोली का कटा हुआ सिर और बिहार के उच्चके

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पत्रकारों को कई विशेषणों से अलंकृत किया जाता रहा है मसलन बिकाऊ, दारुबाज, चमचा, चाटुकार, पिछलग्गू, जालसाज, इत्यादि। साथ ही यह भी उतना ही सच है कि कई लोगों को कठघरे में खड़ा करने वाला मीडिया, खुद भी सवालों के दायरे में आते रहा है। उस पर संगीन आरोप लगते रहे हैं। लोग चीख-चीख कर कहते हैं कि आज का मीडिया बिका हुआ है। वो अपने रास्ते से भटक चुका है, पूरी तरह व्यवसायिक हो गया है, नेताओं का तलवा चाटने वाला और उनके ही टुकड़ों पर पलने वाला जीव हो गया है। और तो और हिन्दी सिनेमा ने भी मीडिया के खिलाफ पुरजोर जंग छेड़ रखी है। हाल ही में आयी फिल्म सिंघम रिटर्न्स में अजय देवगन और करीना कपूर खान मीडिया को भाषण पिलाते और उसका मजाक बनाते देखे जा सकते हैं। यह तो एक उदाहरण है। फिल्मों में तो मीडिया को नीचा दिखाने का प्रचलन ही हो गया है। पर असल ज़िंदगी में करीना ये कर के तो दिखाएं ? सलमान खान के बुरे बर्ताव से तंग आकर जब उनकी तस्वीरें लेने से फोटोग्राफरों ने मना कर दिया तब आमिर खान को मध्यस्थता करनी पड़ी थी।

पर “उच्चका” ? सही में ? कुछ ज्यादा ही अजीब है एक राज्य के मुख्यमंत्री का मीडिया को उच्चका कहना। वैसे सारी बातें शीशे की तरह साफ हैं। किसी भी इंसान के लिए आसान नहीं होता अपनी बुराई सुनना। और पहली बार मुख्यमंत्री बने लोगों के लिए तो बिल्कुल ही नहीं। वैसे मांझी आजकल खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे को चरितार्थ कर रहें हैं। ऐसा तब से हुआ जब से उनके बेटे का नाम गलत कारणों से अखबारों की सुर्खियां बना। छवि उनके बेटे ने उनकी खराब की है और आरोप वे मीडिया पर लगा रहें हैं। क्या कभी बेटे को उन्होंने कहा कि ऐसे “उच्चकों” जैसी हरकत ना करे? हो सकता है कहा हो। खैर जो भी हो, उसी बेचैनी में मुख्यमंत्री एक के बाद एक गलतबयानी कर रहें हैं।

क्या लोग शादी किस तरह से करें और कितने बच्चे पैदा करें, यह भी नेता ही तय करेंगे ? क्या ये बातें, अगर अंग्रेजी का शब्द इस्तेमाल करें, टेलरमेड हो सकती हैं? अंतर्जातीय या प्रेम विवाह के लिए प्रेम का होना जरुरी है, किसी के नसीहत का नहीं। और बच्चे पैदा करना, न करना, भी हर किसी का नीजी मामला है। अब तक ऐसे बयान कट्टरपंथियों के तरफ से आते रहे हैं, अगर समाजवादी इस तरह की बातें कहें तो इसे जनतंत्र पर आने वाले बड़े खतरे की तरह देखा जाना चाहिए।

मीडिया का उद्देश्य है जनतंत्र की रक्षा करना। साथ ही समाज को अतिवादियों से बचाना। उसके ऊपर यह अहम जिम्मेदारी है जिसके लिए असंख्य पत्रकार कठोर बलिदान देते हैं। तब मांझी ऐसा कैसे सोच लेते हैं कि वो कुछ भी बेतुका बोलेंगे और पत्रकार सवाल नहीं उठाएंगे ?

हमारे पड़ोसी राज्य के मुख्यमंत्री भी मीडिया के कारण बड़े बैचैन है। जब से बदायुं की शर्मसार करने वाली घटना सामने आई है, वे मीडिया पर अपने सरकार की छवि खराब करने का आरोप लगाते आ रहें हैं। हद तो तब हो गई जब क्रोध से भरे अखिलेश यादव ने एक महिला पत्रकार से यह पूछ दिया कि “आप क्यूं परेशान हैं, आप तो सुरक्षित हैं ना ?”

नेताओं और समाज के ओहदेदारों का मीडिया पर हमला कोई नई बात नहीं है। ऐसा हमेशा से होते आ रहा है। भारत के पत्रकार फिर भी खुशनसीब हैं कि उन पर चीन और कुछ इस्लामिक देशों जैसे अत्याचार नहीं होते। हमारा मीडिया अभी भी आज़ाद, निष्पक्ष और मजबूत कहा जा सकता है।

इस वक्त जब जेम्स फोली का कटा हुआ सिर पत्रकारों के लिए अंतर्वेदना का कारण बना हुआ है, पूरी मीडिया जाति को उच्चका कहा जाना उत्तेजना से भर देता है। यह बात सही है कि हर फोली और डैनियल पर्ल के लिए उतने ही रेबेका ब्रूक्स भी पत्रकारिता में पानी में चीनी की तरह घुले हैं। यह बात और है कि अभी तक हमारे देश के रेबेका ब्रूक्स सरीखे लोग बच कर निकलते रहें हैं। क्यूंकि कहीं-न-कहीं नेताओं का वरदहस्त जो है। फिर चोर-उचक्के कहलाना कौन सी बड़ी बात है ?

पर यह कहना फिर भी जरूरी है कि अच्छे-बुरे लोग हर जगह होते हैं और आप चंद लोगों के लिए पूरी बिरादरी को बदनाम नहीं कर सकते। मीडिया हजारों मेहनतकश और कर्मठ लोगों के लिए भी जाना जाता है।

फिर पत्रकारों और नेताओं का तो चोली-दामन का साथ होता है। ऐसा सभी भली-भांति समझते हैं। तभी तो लालू प्रसाद यादव पूरे आत्मविश्वास से बिहार के पत्रकारों को कहते हैं – मैं नहीं रहा, तो तुम सबकी दुकान भी नहीं चलेगी। और किसे पता आज का पत्रकार कल का नेता ही हो जाए। जैसे एक वरिष्ठ पत्रकार कांशी राम से थप्पड़ खा कर हो गए। उस पर अब तो राज्य सभा का भी मामला है ।

फिर कहने से होता क्या है ? कहने को तो कोई कुछ भी कहे !