बाढ़ पीड़ितों का छलका दर्द

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सुपौल – बाढ़ पीड़ितों का छलका दर्द। जिलाधिकारी ने कहा अब तक 26 हज़ार पीड़ित को रेस्क्यू किया गया है। सरकारी शिविर में भोजन दवा की मुफ्त व्यवस्था, जबतक बाढ़ पीड़ितों का जीवन सामान्य नहीं हो जाता, शिविर चलता रहेगा।

मुझे जब जब बहारों का जमाना याद आएगा,कहीं अपना भी था एक आशियाना याद आएगा। कल चमन था आज एक सेहरा हुआ, देखते ही देखते ये क्या हुआ।

एक छोटा सा था मेरा आशियाँ, आज तिनके से अलग तिनका हुआ,
सोचता हूँ अपने घर को देख कर, हो न हो ये है मेरा देखा हुआ,
कल चमन था?

जिस तरह हर साल हमारे पर्व होली, दीपावली, ईद बकरीद आती है, उसी तरह जुलाई – अगस्त के महीने में कोशी में हर साल बाढ़ भी आती है और यहाँ के लोगों को हर साल बसना और उजाड़ना नियति बन गयी है।

आज कोशी इलाके में बारिश रुकने के साथ जलस्तर में जैसे-जैसे कमी आ रही है तबाही की भयानक तस्वीरें भी सामने आने लगी है। जिले में कोशी तटबंध के अंदर दर्जनों पंचायत के सेकड़ो घर-द्वार, माल मवेशी इस बाढ़ की विभीषिका के भेंट चढ़ चुकी है।

जिंदगी जीने की तमन्ना एक बार फिर से बाढ़ पीड़ितों को अपने घरों की याद दिला दी, लोग अपने-अपने घरों को ढूंढ़ने फिर तटबंध के अंदर जाने लगें, लेकिन उन्हें क्या पता कल जहाँ चमन था,आज वहां बिरानी है। जहाँ घर था, वहाँ आज कीचड़ मिट्टी है। जहाँ दरवाजा था, वहाँ रेत बिखड़े पड़े हैं।

किसको कौन अपना दर्द दिखायेगा, सभी के साथ यही घटना हुआ है। इस बाढ़ ने किसी का बेटा छिन लिया है, किसी की बेटी, किसी का घर, किसी का माल जाल, किसी की जिंदगी भर की अर्जित संपत्ति छिन लिया है। कोशी ने जो क्षति पहुंचाई, वो बिती बात हो गयी, लेकिन अब इन बाढ़ पीड़ितों को कुछ समझ नहीं आ रहा है कि कहाँ से शुरू करूँ।

एक तो पहले ही कर्ज लेकर घर बनाये, वो कर्ज अभी हटा भी नहीं, फिर से मुसीबत सामने आ गयी। जिंदगी है तो जीना ही पड़ेगा, फिर से तिनके-तिनके को जोड़कर घर बनाना है, फिर से जिंदगी को पटरी पर लाना है।