बिना शिक्षक कोई कॉलेज कैसे पहुंच सकता है, टॉप 20 में – रघुवंश सिंह

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पटना- प्रधानमंत्री ने पटना विश्वविद्यालय के शताब्दी समारोह में केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा देने की बिहार की पुरानी और मुख्यमंत्री द्वारा अतिविनम्रता से की गयी मांग को केवल ठुकराया ही नहीं बल्कि विश्वस्तर का विश्वविद्यालय का दर्जा पाने के लिये प्रतियोगिता में आने की बात कहकर फिर झांसा देने का कार्य किया है। इससे बिहार के एन.डी.ए के नेताओं और मंत्रियों के औकाद भी दिखा दिया है। राष्ट्रीय राजमार्ग की पुरानी और निर्माणाधीन योजनाओं का शिलान्यास कर बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की बिहार की पुरानी मांग को भी नजर अंदाज किया है। इससे मुख्यमंत्री का बिहार के हित के लिये पाला बदलने और केन्द्रीय हुकुमत की पार्टी के साथ मिल जाने से ज्यादा विकास के दावे का भी पोल खुल गया है।

इसके बाद भी मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री के लिये कसीदे पढ़ रहे हैं। प्रधानमंत्री ने यह स्वीकार किया है कि दुनिया के चुने हुए 500 विश्वविद्यालय में अपने देश का एक भी विश्वविद्यालय नहीं है और दावा किया कि देश के दस निजी और दस सरकारी विश्वविद्यालय को विश्वस्तरीय बनाने के लिये दस हजार करोड़ रू0 दिया जायेगा कहकर बिहार को बेवकूफ बनाने का कार्य किया है। दरअसल देश और प्रदेश में शिक्षा का बुरा हाल है। इस ओर दोनों सरकारों का ध्यान अभी तक नहीं गया है। शिक्षकों की कमी से पढ़ाई ठप्प है और केवल बयान एवं प्रचार द्वारा धुआं का पर्वत खड़ा किया जा रहा है। निम्नलिखित शिक्षकों की खाली जगहों को कब तक भरी जाएगी? इसके बिना विकास का क्या मतलब है? आई.आई.टी, आई.आई.एम और एन.आई.टी जैसी अग्रणी संस्थाओं में शिक्षकों के छः हजार पद खाली है। देश में 22 सेन्ट्रल युनिवर्सिटी के भी.सी. का पद दिल्ली युनिवर्सिटी में 22 काॅलेजों के प्रिंसिपल के पद और केन्द्रीय विश्वविद्यालय में शिक्षकों के 60 प्रतिशत पद खाली है।

देश के कुल 1142 केन्द्रीय विद्यालयों 56000 स्टाफ के स्वीकृत पदों के 14000 पद खाली है। प्रिंसिपल के 200 पद रिक्त है और शिक्षकों के 10000 पद रिक्त है। जवाहर नवोदय विद्यालय के 589 प्रिंसिपल के पदों में 125 पद खाली है और शिक्षकों के 2000 पद खाली है। देश भर में प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर दस लाख शिक्षकों को तत्काल बहाल करने की जरूरत है। बिहार राज्य के सभी विश्वविद्यालय में 13564 शिक्षकों के पद में से 7485 पद वर्षो से रिक्त है। 1960 के दसक में विश्वविद्यालय के 2 लाख छात्रों के लिये 15000 शिक्षक थे। अभी दस लाख छात्रों के लिये 5000 शिक्षक है। पटना विश्वविद्यालय जैसे मशहूर विश्वविद्यालय में 1970 के दशक में दस हजार छात्रों के लिये 1024 षिक्षक थे जबकि अभी 18000 छात्रों के लिये 276 षिक्षक हंै। इसका शताब्दी समारोह मनाया जा रहा है, लेकिन इसे केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा नहीं मिला इससे बिहार के लोग निराश हैं।

प्रदेश में उच्च विद्यालयों में 6500 और उच्चत्तर माध्यमिक विद्यालयों में 12000 शिक्षकों के पद खाली है। प्राथमिक विद्यालयों में 2 लाख से ज्यादा शिक्षकों की कमी है। इसी कारण कोचिंग, निजी शिक्षण संस्थानों और ट्यूशन में लोग शोषित हो रहे हैं। अधिक छात्र फेल भी कर रहे है। अतः शिक्षकों के सारे पद भरे जायें और पढ़ाई मानदंड के अनुसार हो नही तो हम आन्दोलन करने को बाध्य हैं। पढ़ाई का बूरा हाल सहन नहीं किया जा सकता है। पढ़ाई नहीं होना अपराध है और इस पर नहीं बोलना भी भारी अपराध है। इस संवाददाता सम्मेलन में मुख्य रूप से पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष डाॅ0 तनवीर हसन, प्रधान महासचिव सह विधायक मुन्द्रिका सिंह यादव, प्रदेश प्रवक्ता चितरंजन गगन एवं आपदा प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष पी0 के0 चौधरी मौजूद थे।