बिस्मिल्लाह खां पर नई किताब

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लेखक मुरली श्रृवास्तव की जबानी

भारत रत्न शहनाई नवाज उस्ताद बिस्मिल्लाह खां किसी परिचय के मोहताज नहीं. विश्व के कोने-कोने में अपने शहनाई से सबको मुरीद बनाने वाले उस्ताद आज अपने पैतृक राज्य में हीं उपेक्षित हैं. बिहार के बक्सर जिले के डुमरांव में जनमे कमरुद्दीन हीं आगे चलकर शहनाई वादक बिस्मिल्लाह खां हुए. भोजपुरी और मिर्जापुरी कजरी पर धुन छेड़ने वाले उस्ताद ने शहनाई जैसे लोक वाद्य को शास्त्रीय वाद्य की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया.

(संयुक्त परिवार की मिसाल थे उस्ताद,एक छत के नीचे रहते थे सौ लोग)

संगीत एक परंपरा है, संगीत एक श्रद्घा है, संगीत एक समर्पण है, संगीत ही एक ऐसा माध्यम है जो हर एक दूसरे को जोड़े रखती है. कई कलाकार आए और अपनी स्वर लहरियां बिखेर कर दुनियां से रुख्सत हो गए.उनके द्वारा गाए-बजाए गए वाद्य उनकी यादें आज भी ताजा कर देती है, उन्हीं में से एक हैं शहनाई नवाज उस्ताद बिस्मिल्लाह खां. कभी छोटी बिलाधरी, बड़ी बिलाधरी से गुलजार रहने वाली बस्तियों में वक्त गुजारने वाले उस्ताद उन लोगों के इंतकाल के बाद कहते थे कि अब इन गलियों में आने को जी नहीं चाहता, क्यों बस्तियां तो वही है, लेकिन अब वो रौनक नहीं. समय गुजरता गया और आज वाराणसी का हड़हा सराय जहां उस्ताद रहते थे, वो भी उन विरान गलियों में शामिल हो गई है. अब जाने कब इस वाराणसी में वादन का संत आएगा, जो संगीत की दुनिया में एक नई इबारत लिखेगा, इसके बारे में कह पाना मुश्किल है.

दिल बहलाने वाली शहनाई की धुन को पहली बार उस्ताद ने वर्ष 1962 में फिल्म-गुंज उठी शहनाई में दिल का खिलौना हाय टूट गया कोई लूटेरा आके लूट गया…में संगीत देकर अपने वादन से सबके दिलों में रच बस गए.वैसे तो उस्ताद ने हजारों फिल्मों में संगीत दिया है लेकिन अपने जीवन में तीन फिल्मों हिन्दी गुंज उठी शहनाई, भोजपुरी बाजे शहनाई हमार अंगना, और मद्रासी फिल्म सनाधि अपन्ना में बतौर म्यूजिक डायरेक्टर रहे.

21 मार्च 1916 को बिहार के बक्सर जिले के डुमरांव में एक गरीब और जलालत की जिंदगी बसर करने वाले पैगम्बर बख्श के यहां बालक कमरुद्दीन ने जन्म लिया. पैगंबर बख्श डुमरांव राज के मोलाजिम थे. उस्ताद ने जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे…गरीबी और जलालत भरी जिंदगी बसर करने वाले परिवार में जन्मे बालक कमरुद्दीन ने महज चौथी की पढ़ाई कर डुमरांव जैसे कसबाई शहर से निकलकर दुनिया के मानचित्र पर अपने संगीत का लोहा मनवाया.जो आज हर किसी की जुबां पर शहनाई की स्वर लहरियां बजते हीं लोग इतना जरुर कहते हैं क्या बजाते हैं उस्ताद, इतनी मिठास की लोग बरबस झुम उठते हैं.
जिस बच्चे को पढ़ा-लिखाकर अब्बा जान बड़ा आदमी बनाना चाहते थे, वहीं बालक कमरुद्दीन को पढ़ने में जी नहीं लगता था, सुबह की बेला में डुमरांव के बांके-बिहारी मंदिर में जाना जहां अब्बा जान शहनाई वादन किया करते थे, शहनाई के इतने शौकिन थे कि इनके लिए अब्बा ने छोटी सी पिपही की तरह बनवा दिया था जिसे लेकर फूंकते रहते थे.इसके अलावे सवा सेर का एक लड्डु के लिए मंदिर और अब्बा के चक्कर काटते रहते थे.क्योकि यहां हर वादक को एक-एक लड्डू डुमरांव राज के तरफ से दी जाती थी.जब इससे फूर्सत मिली तो ढेकवा पोखरा, नहर से मछली मारना, गिल्ली-डंडा खेलना दिन की दिनचर्या में शामिल था.शाम ढलते ही जैसे थक हारकर अपने घर आने के बाद अम्मी के बनाए गोस्त-रोटी पर इस कदर टूट पड़ते लगता कई रोज से भूखे हैं. वक्त ने करवट ली और एक दिन पैगंबर बख्श के दो बेटों में बड़े बेटे शम्सुद्दीन और छोटे बेटे कमरुद्दीन के सर से मां का साया उठ गया. फिर आयी सोतेली मां, मगर कहने को सौतेली, अपने लाडलों से बहुत प्यार करती थी. पर होनी को कुछ और ही मंजूर था दस साल की अवस्था में कमरुद्दीन को उनके मामू अली बख्श अपने साथ वारणसी लेकर चले गए.छुट गई जन्मस्थली गाहे-बगाहे आते तो डुमरांव स्टेशन से बैलगाड़ी पर आते समय बैलों के गले में बंधे घूंघरु में भी इन्हें शहनाई की धून सुनाई देने लगी. मामू के मरने के बाद इन दोनों भाइयो को जिविकोपार्जन के लिए बिस्मिल्लाह एंड पार्टी बनानी पड़ी उसी से कमाई कर अपना पेट भरते थे. आगे चलकर यही बिस्मिल्लाह के नाम से मशहूर हुए कमरुद्दीन.

(भोजपुरी के सबसे बड़े संवाहक, जिन्होंने विश्व में शहनाई पर भोजपुरी गीत बजाकर सबको मुरीद बनाया)

कस्बाई इलाके डुमरांव में जनमें उस्ताद का जीवन बहुत संघर्ष में बीता. हिन्दू-मुस्लिम संस्कृति के बीच की कड़ी बिस्मिल्लाह खां सच की एक मिसाल हैं. जहां लोग जाति-धर्म के पचड़े में पड़े हैं, वहीं पांच समय के नमाजी उस्ताद मंदिर में सुबह और शाम शहनाई पर भजन की धुन छेड़कर भगवान को भी अपने शहनाई वादन से रिझाते थे. संगीत एक श्रद्धा है, संगीत एक समर्पण है संगीत आपसी मेल का सुगम रास्ता भी है. सांसारिक तनाव से दूर कुछ पल बिताने के लिए संगीत ही वो अकेला साथी है जहां दिल को सकूं आता है. वक्त ने कई बदलाव लाए, कई पहलुओं से वाकिफ करवाया. जिंदगी में कई उतार-चढ़ाव देखने वाले उस्ताद 21 अगस्त 2006 को हमेशा के लिए वाराणसी के हेरिटेज अस्पताल में हमेशा-हमेशा के लिए चिरनिद्रा में सो गए, जिन्हें बनारस के कब्रिस्तान फातमान में दफना दिया गया.उनके कब्र से कुछ दूरी पर है जमाने की मशहूर उमरांव जान का मजार.

(डुमरांव जन्मभूमि, बनारस बनी रियाज स्थली तो पूरी दुनिया बनी कर्मस्थली,सौ से भी अधिक देशों में पेश किए कार्यक्रम)

आजादी के बाद पहली बार दिल्ली के दीवान-ए-खास से शहनाई वादन करने वाले उस्ताद ने आजादी के 50 वीं वर्षगांठ पर शहनाई बजाया था.लेकिन जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर दिल्ली के इंडिया गेट पर शहनाई वादन करने की तमन्ना दिल में अधूरी रह गई. जब उस्ताद जिंदा थे तो सभी ने इनके तरफ नजर-ए-इनायत की मगर इनके इंतकाल के बाद कोई इनके घर का पुरसा हाल तक जानने नहीं आता, जिसको लेकर उनके घर वाले खासा नाराज रहते हैं.

बनारस की रुहानी फिजा में मंदिर प्रांगण में घंटों साधना करने वाले उस्ताद एकता और भाईचारे की बहुत बड़ी मिसाल थे. शहनाई को अपनी बेगम मानने वाले उस्ताद ने ऐसी उंचाईयां बख्शी जिन्हें  छू पाना किसी के लिए भी बहुत मुश्किल लगता है. उस्ताद बिस्मिल्लाह खा ने निर्विवाद रूप से शहनाई को प्रमुख शास्त्रीय वाद्य यंत्र बनाया और उसे भारतीय संगीत के केंद्र में लाए। शहनाई के पर्याय कहे जाने वाले खा ने दुनिया को अपनी सुर सरगम से मंत्रमुग्ध किया और वह संगीत के जरिए विश्व में अमन और मोहब्बत फैलाने के हामी थे। संगीत के जरिए विश्व में अमन और मोहब्बत फैलाने, उस्ताद को संगीत के प्रति उत्कृष्ट सेवा के लिए उस्ताद को संगीत के प्रति उत्कृष्ट सेवा के लिए वर्ष 2001 में सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाजा गया, बनारस के बालाजी मंदिर में जहां उस्ताद रियाज करते थे वो आज खंडहर में तब्दील हो चुका है. वहीं डुमरांव की मिट्टी में पले बढ़े उस्ताद वर्ष 1979 में डुमरांव अभिनेता भारत भूषण, नाज, मोहन चोटी के साथ पंद्रह दिनों तक रेलवे अधिकारी डॉक्टर शशि भूषण श्रीवास्तव जो बाजे शहनाई हमार अंगना फिल्म से जुड़े थे के घर ठहरे थे। वे उसके बाद वर्ष 1983 में आखिरी बार आए उसके बाद अस्वश्थ होंने की वजह से नहीं आ सके. डुमरांव से जैसे नाता ही टूट गया।

उसके बाद मेरे दिल में आया कि इनकी स्मृतियों को इकट्ठा किया जाए, जिसे मैंने “शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खां” पर पुस्तक लिखकर संजोने की कोशिश की है. अंत में बस इतना ही कहूंगा  कि कई उम्मीदों को दिल में लिए वो हमेशा के लिए रुख्सत तो हो गए, मगर ऐसे प्रणेता युगों-युगों तक जिंदा रहते हैं…