बिहार का देवघर के नाम से प्रसिद्ध है इन्द्रदमनेश्वर महादेव मंदिर

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लखीसराय- महाशिवरात्री को लेकर इन्द्रदमनेश्वर महादेव मंदिर ट्रस्ट ने मंगलवार को अशोकधाम मंदिर से शिव बारात निकली। शोभायात्रा में अद्भुत झांकीयां भी निकाली जाएगी। सुरक्षा की दृष्टिकोण से जिला प्रशासन ने रूटचार्ट बनाकर अशोक धाम परिसर से लेकर शहर के हर-चौक-चौराहे पर पुलिस की प्रतिनियुक्ति किया है। मंदिर परिसर में हर एक श्रद्वालुओं पर नजर रखने के लिए सीसीटीवी कैमरा लगाया गया है। मेला को नियंत्रण करने के लिए विशेष कक्ष बनाया गया है। जहां दो सदस्य का ध्यान केन्द्रित रहेगा।

8 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर इन इलाकों से होकर गुजरेगी शिव-बारात

शिव-बारात नगर भ्रमण के लिए एन एच-80 से होते हुए विद्यापीठ चौक,पुराना बाजार, थाना चौक, महावीर स्थान, छोटी दूर्गास्थान, शहीद द्वार, नया बाजार, पचना रोड चौक, बड़ी दूर्गा स्थान एवं गौशाला रोड तक जाएगी। पुन: यहां से पचना रोड से होते हुए बाइपास सड़क के द्वारा देर रात 12 बजे तक अशोकधाम मंदिर पहुंचेगी। इसमें चार से पांच हजार शिवभक्त के साथ भूत-पिशाच, औघड़, नरकंकाल के स्वरूप में सैकड़ो लोग शामिल होगें।

बारात की होगी भव्य स्वागत

शहर के गौशाला रोड स्थित निर्मल कानोडिया के आवास पर सभी बारातीयों का भव्य स्वागत किया जाएगा। रंग-अबीर एवं पुष्पवर्षा के साथ-साथ शीतल पेय पदार्थ , फल एवं नाश्ता की भी व्यवस्था की गई।

अशोकधाम में होनेवाले शिव-विवाह कार्यक्रम

सुबह: 08:00 बजे, रूद्राभिषेक

सुबह: 09:30 बजे, डीएम अमित कुमार शिवरात्री मेला का करेंगे उद्घाटन

सुबह: 10:00 बजे, महाप्रसाद का वितरण

सुबह: 11 से संध्या 03 बजे तक, शिवभक्त करेंगे जलाभिषेक

संध्या: 04 बजे,शिव बारात निकलेगी

रात्री: 08 बजे, अशोकधाम मंदिर प्रागंण में शिव महाजागरण का बिहार सरकार के श्रम मंत्री करेंगे उद्घाटन

रात्री: 12 बजे, शिव बारात नगर भ्रमण कर लौटने के बाद होगी पुष्पांजली

14 फरवरी

अहले सुबह 01 बजे से 3 बजे तक शिव-पार्वती की वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ होगी विवाह समारोह

सुबह 04 बजे, सभी शिव भक्तों के लिए मंदिर की पट खुलेगी सबसे बड़ी खासियत है

अशोक धाम में सालों भर प्रतिदिन शादी होता रहता है। वो भी बिना कोई लगन-मूर्हत के, सभी अन्य दिन और रात को नये जोड़े वर-वधु की विवाह पारंपरिक वैदिक रीति-रिवाज से सम्पन्न होता है। इन्द्रदमनेश्वर महादेव मंदिर ट्रस्ट के द्वारा प्रतिवर्ष 50 जोड़े की विवाह संस्था करवाती है। जिसमें सभी जोड़े को 30 हजार रूपयों के शादी में का समान दिया जाता है। जिसमें गद्दा-तकिया, दुलहन पायल, घडी, बक्सा-अटैची, जुता-जुति, सहित शादी में शिरकत करनेवाले सभी बारातीयों के लिए भोजन की व्यवस्था अशोक घाम इन्द्रदमनेश्वर महादेव मंदिर ट्रस्ट करती है। यहां सालों भर प्रतिदिन दर्जनों प्रेम-विवाह, एवं पकडौवा-विवाह बिना रोक-टोक के सम्पन्न होता है। मंदिर में आज भी हजारों लोग प्रतिदिन पूजा-पाठ करते रहते है।

बिहार का देवघर के नाम से प्रसिद्ध है

नगर परिषद क्षेत्र के वार्ड संख्या- 01 में अशोक घाम है, जो आज बिहार का देवघर कहलाता है। अशोक धाम इन्द्रदमनेश्वर महादेव मंदिर में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पूर्व उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी दर्जनों बार मंदिर आकर आर्शिवाद लिया और पूजा- अर्चना कर बिहार की कल्याण के लिए कामना किया।

7 अप्रैल, 1977 ई0 शिवलिंग का हुआ खोज

भोले नाथ ने अशोक नामक चरवाहे को अपने भक्ति की प्रेरणा दी तब तत्पश्चात रजौना चौकी गांव के ग्रामीणों ने खेल-खेल के दरम्यान टीले की खुदाई कर डाला। देखते ही देखते एक अधिमुक्त काले रंग का विशाल शिवलिंग मिला। जिसमें पालवंश का अन्तिम शासक महाराजा इन्द्रद्युम्न के कुछ अवशेष भी देखा गया। यह गणेश चतुर्थी, वैशाख कृष्ण पक्ष संवत् 2034 अंग्रेजी तिथि 7 अप्रैल, 1977 ई0 स्थानीय लाेगों ने अशोक नामक बालक के नाम पर अशोकधाम का नामाकरण कर पूजा-अर्चना शुरू कर दिया। बाद में जिला प्रशासन ने इन्द्रदमनेश्वर महादेव मंदिर ट्रस्ट बनाकर बिहार का देवघर बना दिया।

भव्य शिवलिंग काले रंग का चिकना चौड़ा और लंबा एवं कांतीमय स्वरूप

संसार के अन्य भागोें में, अंगकोरवाट में, अफगानिस्तान में अमेरिका के मेक्सिकों नगर में भी शिवलिंग पाए गए है। लेकिन यह काले रंग का चिकना शिवलिंग चौड़ा और लंबा एवं काफी भव्य कांतीमय है। खुदाई के दौरान शिव के अतिरिक्त विष्णु,लक्ष्मी,भगवती दुर्गा,नंदी आदि की मूर्तियां निकले।

इस पवित्र तीर्थ स्थल के निकट अन्य तीर्थ स्थल हैं जैसे श्रृंगीरिषि आश्रम, सीताकुण्ड, देवी त्रिपुर सुंदरी बड़हिया, भगवान महावीर का जन्म स्थल, लछुवाड एवं महादेव सिमरिया सिकंदरा में हैं। किन्तु इसके साथ पौराणिक एवं ऐतिहासिक साक्ष्य भी जुड़े है। अशोकधाम के आस-पास के लोगों के अनुसार खुदाई के दौरान भगवान शिव के अतिरिक्त विष्णु जी, लक्ष्मी जी, भगवती दुर्गा, नदी आदि की कलात्मक मूर्तियां निकली थी। इससे भी यह निष्कर्ष निकलता है कि कृमिला को अशोकधाम गुप्तकाल में भी अत्यंत महत्वपूर्ण धर्मस्थल था।

ऐतिहासिक प्रमाणिकता

अशोकधाम का नाम पालवंश के अन्तिम शासक राजा इन्द्रद्युम्न होने के कारण इन्द्रदमनेश्वर महादेव मंदिर किया गया। उसके पूर्व धर्मपाल सन 770 से 810 ई0 बौद्ध मतावलम्बी था। उसी ने विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना की थी उसके काल में बौद्व घर्म का विकास हुआ। लेकिन इसके साथ ही मंदिरों के विध्वंस की गति भी तीव्र हुई । 871 ई0 में नारायण पाल शासक हुआ करता था। उसने अपनी राजधानी मुद्रागिरी मुुंगेर में रखी। भागलपुर संग्रहालय के ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि उसने मुद्रागिरि से श्रीनगर पाटलीपुत्रा के बीच 1000 लगभग शिव मन्दिर बनवाये। लेकिन अशोकधाम में दो फीट लंबे और डेढ़ फीट चौड़े एक काले पत्थर पर 1000 शिवलिंग मूर्तियां निर्मित मिले है। शायद यह नारायण पाल द्वारा बनाये गये अनेक शिव मंदिरों का प्रमाण है ।

मुंगेर गजेटियर में चर्चा

इन्द्रद्युम्न पाल अपने वंश का अन्तिम शासक था। उसकी राज्य सीमा खड़गपुर, मुंगेर, जयनगर लखीसराय थी। बख्तियार खिलजी ने इसे पराजित किया था। वे पत्नी के साथ नित्य ही अशोकधाम शिवपूजन के लिए जाते थे। वहीं इस मंदिर होते हुए जलप्पा स्थान, श्रृंगीरिषि भी जाया करता था। उन्होेंने ही इस शिव मंदिर का निर्माण करवाया। जिसकी नींव 1977-78 ई0 की खुदाई में दिखाई पड़ी। इसी कारण इस शिवलिंग का नाम इन्द्रदमनेश्वर महादेव पड़ गया। लखीसराय समाहरणालय के बगल में जयनगर लाली पहाड़ी पर इन्द्रद्युम्न के भवन का अवशेष पाया गया है। इसकी चर्चा मुंगेर गजेटियर में किया गया है ।

लाॅर्ड कर्निंघम के द्वारा वर्णित पुरातात्विक सर्वेक्षण के आधार पर

इस क्षेत्र की ऐतिहासिकता के संबंध में लाॅर्ड कर्निंघम के द्वारा वर्णित पुरातात्विक सर्वेक्षण प्रतिवेदन में भी विवरण दिया हुआ है। जिसका उल्लेख आचार्य राम रघुवीर ने अपनी उपर्युक्त पुस्तक में भी किया है। कर्निंघम को हरूहर और कियुल नदी के संगम पर 4 मील लंबे और 1 मील चौड़े क्षेत्रों में एक विशाल नगर की अवस्थिति का पता चला था। यहां बौद्वघर्म होने की संभावना का अनुमान लगाया था। उसने दूसरे टीले के अंदर अपेक्षाकृत प्राचीन मंदिर के अवशेष की संभावना जतायी थी। कर्निंघम ने कतिपय शिव, विष्णु आदि मंदिरों के अवशेष का वर्णन किया है। एक चतुर्भुजाकार टीले पर भगवान विष्णु की 3 छोटी और 1 बड़ी प्रतिमा उसे मिली थी। वहां पत्थर के खण्डों पर शंख लिपि में खुदे अक्षर भी थे । यह लिपि 7-8वीं शताब्दी में सम्पूर्ण भारत में प्रचलित थी।

स्टेशन से मात्रा 6 किलोमिटर कि दुरी पर स्थित अशोकधाम

अशोकधाम की महिमा न्यारी और प्यारी है। इस मंदिर के धर्मस्थल जाने के लिए लखीसराय एवं किउल स्टेशन से रिक्शा, टमटम एवं टैक्सी मिलती है। यह स्टेशन से मात्रा 6 किलोमिटर कि दुरी पर स्थित हैं। राजधानी पटना से 125 किलोमिटर पुरब राष्ट्रीय उच्च पथ नेशनल हाईवे 80 पर से लगभग 1 किलोमीटर की दुरी पर भोलेनाथ अशोकधाम अवस्थित हैं।

शिवरात्रि 13 या 14 फरवरी को, वेद-वेदांत के अनुसार सही तिथि और मुहूर्त

अाचार्य पं0 महेन्द्र मिश्र ने बताया कि शास्त्रों की मानें तो महाशिवरात्रि त्रयोदशी युक्त चतुर्दशी को ही मनाई जानी चाहिए। इस हिसाब से 13 फरवरी को ही महाशिवरात्रि मनाई जानी चाहिए। काशी पञ्चाङ्ग के अनुसार, 13 और 14 फरवरी को महाशिवरात्रि मनाई जाएगी। महाशिवरात्री वेद-वेदांत संस्कृत गुरूकुल के अनुसार 13 फरवरी को ही शुभ मुहूर्त है। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को महाशिवरात्रि पर्व मनाया जाता है। माना जाता है कि सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्यरात्रि को भगवान शंकर का ब्रह्मा से रुद्र के रूप में अवतरण हुआ था। वर्ष 2018 में महाशिवरात्रि की तिथि को लेकर संशय है क्योंकि इस वर्ष फरवरी माह की 13 एवं 14 दोनों ही तारीखों में चतुर्दशी का संयोग बन रहा है। इस पवित्र त्योहार को दो दिन मनाने की स्थिति बन रही है। भोलेनाथ सदैव जाग्रत अवस्था में रहते है। कहते हैं कि महाशिवरात्रि में किसी भी प्रहर अगर भोले बाबा की आराधना की जाए। अशोकधाम मंदिर में 13 फरवरी को ही वैदिक विधि-विधान के साथ महाशिवरात्री मना रही है।

शिव पूजन का महानिशा काल का मुहूर्त :13 फरवरी को रात्रि 12:15 से 01:06 मिनट

हिंदू पंचांग के मुताबिक फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। मान्यताओं के मुताबिक इसी दिन शिव और पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था। इसमें महानिशा काल का मुहूर्त 13 फरवरी को रात्रि 12:15 से 01:06 मिनट तक रहेगा। सामान्यतः चतुर्दशी तिथि 13 फरवरी को रात्रि 10:22 से शुरू होकर 14 फरवरी को 12:17 तक रहेगी। अतः 14 को पूर्ण महानिशा काल उपलब्ध नहीं होगा। महा निशा काल में की गई शिव पूजा ही श्रेष्ठ मानी जाती है। हालांकि कांवड़ जल चढ़ाने और व्रत रखने के लिए 13 और 14 दोनों तारीखें शुभ हैं।

पूजा के दौरान क्या-क्या चढ़ाएं शिवलिंग पर

शिव को दूध, गुलाब जल, चंदन, दही, शहद, घी, चीनी और जल का प्रयोग करते हुए तिलक लगाएं। भोलेनाथ को वैसे तो कई फल अर्पित किए जा सकते हैं। लेकिन शिवरात्रि पर बेर जरूर अर्पित करें क्योंकि बेर को चिरकाल का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि शिवलिंग या भगवान शिव की मूर्ति पर केवल सफेद रंग के ही फूल ही चढ़ाने चाहिए। क्योंकि भोलेनाथ को सफेद रंग के ही फूल प्रिय हैं। शिवरात्रि पर भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए चंदन का टीका लगा सकते हैं। शिवलिंग पर कभी भी कुमकुम का तिलक ना लगाएं। हालांकि भक्तजन मां पार्वती और भगवान गणेश की मूर्ति पर कुमकुम का टीका लगा सकते हैं। भगवान शिव को धतूरा अत्यंत प्रिय है। इसलिए भगवान शिव की पूजा में धतूरा जरूर शामिल करना चाहिए। धतूरे के साथ धतूरे का फूल भी भगवान शिव को अर्पित करना अच्छा होता है। महाशिवरात्रि पर शिवलिंग पर दूध या गंगाजल से भगवान शिव का अभिषेक करना बहुत उत्तम होता है। इसके साथ चंदन, बेलपत्र, बेर और गन्ने का रस, गेंहू, जौ, सफेद तिल चढ़ाने से अलग-अलग मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

सबसे जरूरी और ध्यान में रखने की बात

शिवरात्रि का उपवास रख रहे हैं तो आपको सुबह जल्दी उठकर स्नान कर लेना चाहिए और गर्म पानी से शरीर की सारी अशुद्धि दूर करनी चाहिए। नए वस्त्र पहनना जरूरी नहीं है लेकिन साफ-सुथरे कपड़े ही पहनें। शिवरात्रि पर चावल, दाल और गेहूं से बने खाद्य पदार्थों से दूर रहना चाहिए। भक्तजनों को फल, दूध, चाय, कॉफी इत्यादि का सेवन करना चाहिए। ऐसा कहा जाता है कि शिवरात्रि पर भक्तों को सोने के बजाए जागरण करना चाहिए। रात्रि जागरण के समय भगवान शिव के भजनों और आरती गाना चाहिए। व्रत को अगली सुबह स्नान के बाद प्रसाद ग्रहण करके और भगवान शिव को तिलक लगाकर तोड़ा जा सकता है।