बिहार में कृषि विकास की क्षमता के स्रोत एवं संभावनाओं पर राउण्ड टेबुल काॅन्फ्रेंस का आयोजन

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पटना – बिहार के उपमुख्यमंत्री, सुशील कुमार मोदी की अध्यक्षता में “Unleashing Bihar’s Agriculture Potential: Sources and Drivers of Agriculture Growth” विषय पर राउण्ड टेबुल काॅन्फ्रेंस का आयोजन कृषि विभाग, बिहार सरकार तथा इन्डियन काॅन्सिल फाॅर इन्टरनेशनल एकोनाॅमिक रिलेशन्स के द्वारा संयुक्त रूप से होटल मौर्या, पटना में किया गया।

सुशील कुमार मोदी ने कहा कि इन्डियन काॅन्सिल फाॅर इन्टरनेशनल एकोनाॅमिक रिलेशन्स के रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि वर्ष 2005-06 से 2014-15 के बीच बिहार में कृषि विकास का दर राष्ट्रीय औसत से अधिक रहा है। इस अवधि में बिहार का कृषि विकास दर 4.7 प्रतिशत था जबकि राष्ट्रीय औसत 3.6 प्रतिशत था। विकास कार्यक्रमों का फलाफल यह हुआ है कि राज्य में वर्ष 2016-17 में 185 लाख मिट्रीक टन रिकाॅर्ड खाद्यान्न उत्पादन हुआ है। वर्ष 2005-06 में चावल का उत्पादकता स्तर 1.1 टन प्रति हेक्टेयर था जो वर्ष 2016-17 में बढ़कर 2.5 टन प्रति हेक्टेयर हुआ है। वर्ष 2005-06 में मक्का का उत्पादकता 2.0 टन प्रति हेक्टेयर था 2016-17 में बढ़कर 5.3 टन प्रति हेक्टेयर हो गया है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2012 में चावल उत्पादन वर्ष 2013 में गेहूँ उत्पादन तथा वर्ष 2016 में मक्का उत्पादन में उत्कृष्ट उपलब्धि के लिए राज्य को कृषि कर्मण पुरस्कार मिला है।

ऊर्जा विभाग मंत्री बिजेन्द्र प्रसाद यादव ने अपने संबोधन में कहा कि प्रथम एवं द्वितीय पंचवर्षीय योजना में ग्रामीण क्षेत्रों में बजट का प्रावधान ज्यादा किया गया था लेकिन प्रारम्भ से ही बिहार को पंचवर्षीय योजनाओं में उतनी वित्तीय सहायता नहीं प्रदान की गई, जितना अन्य राज्यों को। खाद्य सुरक्षा अधिनियम में बिहार के परिवेश में स्वामीनाथन समिति की रिर्पाेट सराहनीय है। यह सच्चाई है कि बिहार में कृषि की क्षमता होने के बावजूद भी अभी हम सर्वश्रेष्ठ उत्पादक राज्यों से पीछे है। उन्होंने कहा कि बिहार में कृषि के लिए अलग से फीडर की व्यवस्था की जा रही है, और आने वाले दो वर्षो में राज्य में सिंचाई बिजली आधारित होगी। इस प्रकार, बिहार में कृषि डीजल से सिचाई दो साल में डीजल से मुक्त होगा।

कृषि विभाग मंत्री डाॅ॰ प्रेम कुमार ने कहा कि 2006 से लगातार कृषि के विकास के कार्यक्रमों की चर्चा की गयी। 2008 से 2012 तक पहले कृषि रोडमैप तथा वर्ष 2012 से 2017 तक दुसरे कृषि रोडमैप को लागू किया गया है। अगले पाँच वर्षों के लिए तीसरे कृषि रोडमैप पर भी काम प्रारम्भ हो गया है। कृषि विकास की योजनाऐं धरातल पर आने लगी हैं। उन्होंने कहा कि बीज से संबंधित कई महत्वाकांक्षी योजनाओं को लागू किया गया है। कृषि प्रक्षेत्रों पर बीज उत्पादन किया जा रहा है। बिहार राज्य बीज निगम को पुनर्जिवित किया गया है। बिहार राज्य बीज प्रमाणन एजेंसी को सुदृढ़ किया गया है। कृषि विश्वविद्यालयों में प्रजनक बीज के उत्पादन की व्यवस्था सुदृढ़ की गयी है। इन सबका परिणाम है कि पिछले 10 वर्षों में धान का बीज विस्थापन दर 11 प्रतिशत से बढ़कर वर्तमान में 42 प्रतिशत एवं गेंहूँ का बीज विस्थापन दर 10 प्रतिशत से बढ़कर 36 प्रतिशत हो गया है।

उन्होंने कहा कि फसल, बागवानी के साथ-साथ कृषि की सभी विधाओं को कृषि रोडमैप में शामिल करके एक समग्र कृषि विकास की योजना को राज्य में मूर्त रूप दिया जा रहा है। कृषि रोड मैप में कृषि से संबंधित 12 विभागों के कार्यक्रम शामिल किये गये हैं। अगले 5 वर्षों में कृषि रोड मैप पर 1.54 लाख करोड़ रूपये व्यय किये जायेंगे। राज्य सरकार कृषि रोड मैप को लागू कर हम अगले 5 वर्षों में किसानों की आमदनी दोगुना करने के प्रति संकल्पित है।

जल संसाधन मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि राज्य में लगभग 52 लाख हे0 में सिचाई की क्षमता है जिसमें 29.69 लाख हे0 क्षेत्र में सिचाई क्षमता सृजित की गई है। उन्होंने कहा कि गत वित्तीय वर्ष में 3 लाख हे0 क्षेत्र में अतिरिक्त सिचाई क्षमता का विकास किया गया है तथा इस वित्तीय वर्ष में भी 3 लाख हे0 क्षेत्र में सिचाई क्षमता विकसित किया जा रहा है। बिहार में बाढ़ प्रबधन सबसे बड़ी चुनौती है। क्योंकि मध्य प्रदेश, छतीसगढ़, झारखण्ड एवं उतराखण्ड जैसे सीमावर्ती जिलों तथा नेपाल जैसे देश में अधिक बारिश का दुष्प्रभाव राज्य को झेलना पड़ता है। गंगा नदी में सिल्ट एवं गरद भी बड़ी समस्या है। उन्होंने कहा कि सिल्ट के कारण नदी की गहराई घट गई है और अत्याधिक वर्षा या अन्य स्थानों से पानी आने के कारण नदियों में सर्वोच्च बाढ़ स्तर (एच0एफ0एल0) उत्पन्न हो जाता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि बक्सर से गंगा नदी में पानी का बहाव पटना के गाॅधी घाट तक पहुँचने में चार से पाँच घंटा लगता है। जबकि भागलपुर से फरक्का तक पानी का बहाव पहुँचने में तीन दिन लगता है। इसलिए यह आवश्यक है कि सिल्ट प्रबंधन पर एक बृहद अध्ययन किया जाये।

इन्डियन काॅन्सिल फाॅर इन्टरनेशनल एकोनाॅमिक रिलेशन्स, नई दिल्ली स्थित एक स्वतंत्र संस्था है, जो नीति संबंधित विषयों पर सतत अनुसंधान करती है तथा इससे संबंधित पक्षों को अवगत कराती है। इन्डियन काॅन्सिल फाॅर इन्टरनेशनल एकोनाॅमिक रिलेशन्स के द्वारा बिहार की कृषि के संबंध में एक रिपोर्ट तैयार किया गया है। इस रिपोर्ट को प्रो॰ अशोक गुलाटी, अन्बारूल होदा तथा पल्लवी राजखोवा ने तैयार किया है। इन्डियन काॅन्सिल फाॅर इन्टरनेशनल एकोनाॅमिक रिलेशन्स के रिपोर्ट में कृषि क्षेत्र के विकास के लिए बिजली, सड़क तथा मार्केटिंग के आधारभूत संरचना के विकास की आवश्यकता को उल्लेखित किया गया है। न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अनाज की अधिप्राप्ति की व्यवस्था को सुदृढ़ करने की अनुशंसा की गयी है। इस रिपोर्ट में पशुपालन एवं मछली पालन की अपार संभावनाओं को भी उल्लेखित किया है तथा इसके लिए उपयुक्त पशु प्रजनन नीति तथा पशु आहार एवं पशु स्वास्थ्य के लिए सुदृढ़ व्यवस्था की अनुशंसा की गयी है।

इस रिपोर्ट में विगत 10 वर्षों में फसलों के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता के बावजूद पंजाब तथा अन्य विकसित कृषि प्रदेशों की तुलना में धान एवं गेहूँ की उत्पादकता कम होने के तरफ ध्यान आकर्षित किया गया है। इस रिपोर्ट में उपयुक्त नीतिगत हस्तक्षेप के माध्यम से फसल और बागवानी के क्षेत्र में भी अपार संभावनाओं को दिखाया गया है।
आगत अतिथियों का स्वागत कृषि उत्पादन आयुक्त श्री सुनिल कुमार सिंह के द्वारा किया गया तथा धन्यवाद ज्ञापन निदेशक, उद्यान श्री अरविन्दर सिंह द्वारा संयुक्त रूप से किया गया।

इस अवसर पर प्रधान सचिव, कृषि विभाग, सुधीर कुमार, अध्यक्ष-सह-सदस्य, राजस्व पर्षद त्रिपुरारी शरण, भारत सरकार के पूर्व कृषि सचिव टी. नन्द कुमार एवं सेराज हुसैन तथा राज्य सरकार के कृषि रोड मैप से संबंधित विभागों के सचिव/प्रधान सचिव/निदेशकगण, अभियंता प्रमुख स्तर के पदाधिकारीगण, कृषि विश्वविद्यालयों के कुलपति, आई.सी.ए.आर., राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केन्द्र के वैज्ञानिकों एवं इन्डियन काॅन्सिल फाॅर इन्टरनेशनल एकोनाॅमिक रिलेशन्स के पदाधिकारीगण उपस्थित है।