बिहार में पहली बार क्लाइमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर परियोजना की शुरूआत की जा रही है – डाॅ॰ प्रेम कुमार

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पटना – बिहार के कृषि विभाग मंत्री डाॅ॰ प्रेम कुमार की अध्यक्षता में बामेती, पटना के सभागार में Scaling of climate Smart Agriculture (CSA) through mainstreaming climate smart villages (CSVs) in Bihar विषय पर कार्यशाला का आयोजन किया गया। मंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि वर्तमान समय में खरीफ और रबी मौसम में न्यूनत्तम और औसतन तापमान में वृद्धि, गर्म लहर की उच्च आवृत्ति सहित गर्म दिन एवं रात बढ़ रहे हैं, जबकि ठण्ड के दिनों एवं रात की संख्या में कमी आई है। वर्षा पैटर्न में वर्षा की तीव्रता में वृद्धि और बरसात के दिनों की संख्या कुल वार्षिक वर्षापात की मात्रा में कमी के साथ एक बड़े अंतर-अस्थायी परिवत्र्तनशीलता को दर्शाता है। कभी माॅनसून का विलम्ब से आना, कभी माॅनसून का पहले आ जाना तथा बाद में लम्बे समय तक सुखाड़ रहना, बिहार में वर्षा का आंतरिक और असमान वितरण, कम वर्षा के कारण सुखाड़ या मिट्टी में नमी कम होती है। दक्षिण बिहार में बराबर सुखाड़ और उत्तर बिहार में बाढ़ का एक साथ आना, धान फसल की विलम्ब से बुआई के फलस्वरूप विलम्ब से धान फसल की कटनी होने के कारण विलम्ब से गेहूँ की बोआई होती है। इसके परिणामस्वरूप उच्च तापमान एवं उष्ण लहर/तरंग के कारण गेहूँ की उपज में कमी होती है। इन्हीं सब को देखते हुए पायलट परियोजना के रूप में बिहार में पहली बार क्लाइमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर परियोजना की शुरूआत की जा रही है। यह परियोजना 23,06,62,000 रू॰ का है, जिसमें से अभी प्रत्येक कारिडोर को 1,69,75,600 रू॰ की दर से कुल 6,79,02,400 रू॰ उपलब्ध कराया गया है।

मंत्री ने कहा कि जलवायु स्मार्ट कृषि के अंतर्गत प्रत्येक कोरिडोर के चिन्हित जिलों पटना, नालंदा, समस्तीपुर, दरभंगा, भागलपुर, मुंगेर, पूर्णियाँ एवं कटिहार में पायलट परियोजना के रूप में जलवायु स्मार्ट गाँवों को पहचानकर इस परियोजना के माध्यम से उसे विकसित किया जाएगा। प्रत्येक कोरिडोर में 25 गाँवों को चयनित किया जाएगा और प्रत्येक चिन्हित गाँवों के 100 किसानों को इस परियोजना से लाभान्वित किया जाना है। बिहार में बाढ़, सुखाड़, तूफान, ओलावृष्टि, भूकम्प और कई प्राकृतिक और मानव निर्मित आपदायें घटित होती है, जो बिहार में उपजाऊ मिट्टी, पर्याप्त वर्षापात एवं भूजल की उपलब्धता के बावजूद कृषि प्रक्षेत्र की उत्पादकता को प्रभावित करती है। उत्तरी बिहार के क्षेत्र के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 74 प्रतिशत बाढ़ग्रस्त है, जबकि दक्षिणी बिहार सूखे से प्रभावित होता है। इस प्रकार कृषि प्रक्षेत्र की असुरक्षा एवं विभिन्न प्राकृतिक खतरों को समझना जरूरी है। इस योजना के तहत् गेहूँ, मक्का, चावल, दाल, तेलहन एवं सब्जी के तनाव, सहनशील, अधिक उपजशील प्रभेदों को विकसित किया जाएगा एवं इसके लिए सामरिक अनुसंधान भी किया जाएगा।

डाॅ॰ कुमार ने कहा कि जलवायु परिवत्र्तन का प्रभाव फलों, सब्जियों, चाय, काॅफी, सुगंधित एवं औषधीय पौधों आदि की गुणवत्ता पर प्रतिकुल प्रभाव पड़ता है। तापमान में वृद्धि से भूजल की मात्रा कम हो जाती है और सिंचाई क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। बिहार राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 94.2 हजार वर्ग किलोमीटर का विभाजन गंगा नदी के द्वारा दो अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रफल में किया गया है, जिसमें उत्तरी बिहार का 53.3 हजार वर्ग किलोमीटर तथा दक्षिणी बिहार का 40.9 हजार वर्ग किलोमीटर सम्मिलित है। बिहार एक कृषि प्रधान राज्य है, जो कृषि राज्य की अर्थव्यवस्था के समग्र विकास के रूप में अग्रसर है। राज्य की आबादी का अधिकांश हिस्सा कृषि एवं सम्बद्ध कार्यों में शामिल है, जो राष्ट्रीय औसत से काफी ज्यादा है। सभी उद्यमों यथा फसल, बागवानी, दूध, मांस, अंडे और मछलियों में कम उत्पादकता परंपरागत रूप से कृषि का वर्णन करती है। कम उत्पादकता इसके कम आय एवं अधिक गरीबी पर असरदार प्रभाव डालती है। जून से सितम्बर के बीच भारतीय ग्रीष्मकालीन माॅनसून वर्षा का स्थायी तथा अस्थायी रूप से वितरण मुख्य रूप से कृषि उपज को प्रभावित करता है।

उन्होंने कहा कि औसत से न्यूनत्तम एवं अधिकत्तम तापमान में विचलन पौधों की शारीरिक स्थिति, श्वसन, पानी की आवश्यकता एवं विकास को प्रभावित करती है, जिसके फलस्वरूप पैदावार भी प्रभावित होती है। जलवायु परिवत्र्तनशीलता सीधे फसल स्तर पर पैदावार को ही न प्रभावित करती है बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता और जल संसाधन को भी प्रभावित करती है एवं कीड़े-बीमारियों और खरपतवारों को भी उत्पन्न करती है। जलवायु परिवत्र्तन से निपटने के लिए किसान की क्षमता को मजबूत करने हेतु कृषि प्रणाली के साथ जुड़े लोगों में जागरूकता एवं उनके क्षमता में सुधार किया जाएगा। पर्यावरण के अनुकूल कृषि प्रौद्योगिकियों के लिए उच्च दरों पर किसानों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु एक परम्परागत विधि एवं वैज्ञानिक पद्धति का मिश्रण किया जाएगा, ताकि अधिक-से-अधिक किसान आत्मनिर्भर बन सके। किसान की सामाजिक, आर्थिक और शारीरिक स्थिति के अनुसार विभिन्न जलवायु स्मार्ट कृषि के कार्यक्रमों एवं तकनीक को इस्तेमाल करने में यह परियोजना कारगर साबित होगा। यह परियोजना तीन वर्षों तक चलेगी।

प्रधान सचिव, कृषि विभाग सुधीर कुमार ने अपने संबोधन में कहा कि आज के समय में माननीय मंत्री, कृषि द्वारा शुभारम्भ किया गया भारत सरकार द्वारा सम्पोषित यह परियोजना प्रासंगिक एवं उपयोगी है। वातावरण में काफी परिवत्र्तन हो रहा है, उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि इस वर्ष मई एवं जून महिने में काफी उमस भरी गर्मी थी। तापमान आर्द्रता तथा असामान्य वर्षांपात जलवायु परिवत्र्तन के मुख्य कारक है। जुलाई महिने के अंतिम सप्ताह में वर्षांपात होने के कारण किसानों द्वारा अधिक अवधि के बिचड़ा लगाया जा रहा है, जिससे उत्पादन एवं उत्पादकता दोनों प्रभावित होगी। उन्होंने कहा कि इस परियोजना में मुख्यतः तीन अवयव हैं, खाद्य सुरक्षा, जलवायु परिवत्र्तन के प्रभाव को कम करने के उपाय तथा जलवायु परिवत्र्तन के परिपेक्ष्य में नई तकनीकियों का समावेश।

इस कार्यशाला में निदेशक उद्यान नन्दकिशोर, डाॅ॰ राजेन्द्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर के निदेशक शोध डाॅ॰ मिथिलेश कुमार, बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर, भागलपुर के सह निदेशक प्रसार शिक्षा डाॅ॰ आर॰एन॰ सिंह, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्, पूर्वी क्षेत्र, पटना के प्रधान वैज्ञानिक डाॅ जे॰पी॰ मिश्रा, सिमेट बीसा के प्रधान वैज्ञानिक डाॅ॰ एम॰एल॰ जाट, निदेशक, बामेती डाॅ॰ जीतेन्द्र प्रसाद, नाबार्ड, पटना के महाप्रबंधक सुशील कुमार सहित राज्य में जलवायु परिवत्र्तन योजना के लिए चिन्हित कोरिडोर के नोडल पदाधिकारीगण, परियोजना अन्वेशकगण, परियोजना से जुड़े किसान भाईयों एवं बहनों ने भाग लिया।