बिहार में प्रशासनिक चूक से कई बार मातम में बदले त्योहार

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पटना: राजधानी पटना में दस दिन पहले आयोजित प्रकाश पर्व पर प्रशासन ने भीड़ प्रबंधन और अतिथि सत्कार का शानदार उदाहरण पेश किया। लाखों बाहरी श्रद्धालुओं की भीड़ के बावजूद जितनी पर्याप्त और सुंदर व्यवस्था की गई उसका गुणगान विदेश तक से हुआ। लेकिन गंगा घाट और पीएमसीएच में जुटे पीड़ित तथा शहर के आमोखास हर कोई सवाल करता रहा कि मकर संक्रांति पर पतंगोत्सव में होने वाली भीड़ को लेकर पटना प्रशासन क्यों और कैसे चूक गया?

पटना में प्रशासन की आधी-अधूरी तैयारियों से छठ पूजा, गांधी मैदान में दशहरा हादसा के बाद शनिवार को मकर संक्रांति भी मातम में बदल गई। क्षमता से अधिक लोगों के सवार होने से नाव गंगा में समा गई। नाव पर अधिक लोगों के सवार होने की एक ही वजह रही कि करीब 30 हजार लोगों की भीड़ के लिए नावों का पर्याप्त प्रबंध नहीं किया गया था।

हादसे के बाद सारण और पटना जिला प्रशासन में समन्वय का अभाव दिखा। पटना प्रशासन के अनुसार पतंगोत्सव के लिए प्रशासनिक जिम्मेदारी छपरा जिला प्रशासन को सौंपी गई थी। सोनपुर एसडीओ मदन कुमार बताते हैं कि कार्यक्रम स्थल सबलपुर दियारा के लिए दो मजिस्ट्रेट तथा 4 पुलिस अधिकारी, तीन सुपरवाइजर और 64 पुलिसकर्मी की डय़ूटी लगाई गई थी।

पर्यटन निगम की तरफ से पतंगोत्सव के लिए दो स्टीमर के अलावा मॉनिटरिंग के लिए तीन छोटे नाव, करीब 10 दस निजी नावों की व्यवस्था थी। एसडीआरएफ की तरफ से दस नावें थीं, जिनसे पेट्रोलिंग होनी थी।

गांधी घाट पर पटना जिला प्रशासन की तरफ से चार नाव और चार गोताखोर की व्यवस्था की गई थी। पटना जिला प्रशासन का कहना है कि निजी नाव पर प्रतिबंध था। तब सवाल है कि वहां मौजूद पुलिसकर्मी फिर क्यों निजी नाव पर लोगों को मुफ्त में चढ़ा रहे थे।

पर्यटन विभाग ने केवल पतंगबाजी का पत्र भेजा था। पतंगबाजी स्थल पर सुरक्षा मुहैया कराई गई थी। जहां नाव डूबी है वह कार्यक्रम स्थल से एक किमी दूर है।

19 नवंबर 2012: छठ के दिन डूबते सूर्य को पहला अघ्र्य देने के दौरान चांचर पुल पर मची भगदड़ में 22 लोगों की मौत हो गई।

4 अक्टूबर 2014: दशहरा के दिन रावण दहन के दौरान गांधी मैदान में मची भगदड़ में 33 लोगों की जान गई थी।

14 जनवरी 2017: मकर संक्रांति के दिन पतंगोत्सव से लौट रहे लोगों से भरी नाव के साथ 24लोगों की गंगा में डूबकर मौत हो गई।