बेरोजगार युवाओं के लिए एक उदाहरण बने इंजीनियर ने नौकरी छोड़ गांव में शुरू की रोजगार

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दया नन्द तिवारी

रोहतास – धान के कटोरा कहे जाने वाले रोहतास जिला में अब नई प्रयोग से लोग मालामाल हो रहे हैं इसी कड़ी में गांव में खुशहाल लाने की ललक में जिला के संझौली के रहने वाले आईआईटियन राकेश कुमार वर्मा 15 लाख वार्षिक पैकेज की नौकरी छोड़ दी और अब गांव में रोजगार शुरू कर 40-50 लाख कर रहे हैं वार्षिक आमदनी।

राकेश कुमार ने बताया कि वर्ष 2002 -2014 तक नौकरी की लेकिन उन्हें लगा कि नौकरी से व्यक्तिगत कमाई हो सकती है लेकिन गांव में रोजगार तलाशने से अन्य बेरोजगार युवक को भी रोजगार मुहैया कराया जा सकता है। यही ललक ने बैंगलोर के आईटी इनफार्मेंशन टेक्नोलॉजी में इंजीनियर के नौकरी कर रहे राकेश कुमार वर्मा को गाँव की मिट्टी खिंच लायी।

उन्होंने गांव लौटकर मछली व मुर्गी पालन की प्रशिक्षण प्राप्त की तथा अब राकेश कुमार वर्मा अपने तीन एकड़ भूमि में सात तालाबों की खुदाई कराकर आज मछली पालन के व्यवसाय से अपनी अलग पहचान बनाकर लोगों की प्रेरणास्रोत बने हैं। कई बेरोजगार युवक व पारम्परिक खेती से नुकसान से चिंतित लोग राकेश कुमार वर्मा से अनुभव प्राप्त कर रहे हैं। वहीं दर्जन भर मजदूर को गाँव की मिट्टी में ही काम दिया है, जिससे मजदूरों को भी शहर की रूख नहीं करना पड़ता है।

राकेश कुमार वर्मा ने आईआईटी दिल्ली से इलेक्ट्रॉनिक्स में इंजीनियरिंग करने के बाद प्रोजेक्ट मैनेजमेंट में एमबीए किया। बेंगलुरु के आईटी इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी में इंजीनियर की नौकरी करने लगे। 15 लाख का वार्षिक पैकेज व बेहतर कैरियर से जिंदगी खुशहाल था, लेकिन गांव में कुछ अलग करने की इच्छा व ग्रामीण लड़कों को रोजगार के प्रति जागरूक कर उन्हें बेहतर भविष्य दिलाने के लिए नौकरी छोड़ने पर विवश कर दिया। पारिवारिक विरोध के बाद भी मछलीपालन से व्यवसाय शुरू किया। किसान के रूप में स्वयं को ढाल लेना शुरू में तो बहुत ही कठिन लगा, लेकिन अब युवाओं के प्रेरणास्रोत बन उन्हें रोजगार के लिए प्रेरित कर रहे हैं। उच्च शिक्षा व मोटी सैलरी को छोड़ राकेश वर्मा बेरोजगार युवाओं के लिए एक उदाहरण बन गए हैं। रोजगार नहीं मिलने की रोना रो रहे युवा आज इनसे सीख लेकर मछलीपालन व मुर्गीपालन कर रहे हैं।

राकेश कुमार वर्मा ने बताया पिता अयोध्या प्रसाद सिंचाई विभाग में कार्यपालक अभियंता थे। नौकरी में रहते हुए भी गांव में खेती करते थे। उन्हीं से मिली प्रेरणा के बाद इस व्यवसाय से जुड़ने का मन बनाया अाैर सफल हुआ। आईआईटी करने के बाद राकेश को अभियंता के रूप में आईटी, दिल्ली में 2002 में पहली नौकरी मिली। 2010 में प्रोजेक्ट मैनेजमेंट से एनडीए करने के बाद बेंगलुरु सिटी से जुड़ गए 2014 में नौकरी छोड़ दी और मछलीपालन के व्यवसाय से जुड़ गए। शुरुआती दौर में तो काफी परेशानियां आईं। क्षेत्र के लोगों ने भी मजाक उड़ाया पर आज वेे लोग ही प्रशंसा कर रहे हैं। सुनियोजित रूपरेखा तैयार कर काम करना शुरू किया धीरे-धीरे स्थिति सुधरती गई और राकेश सालाना 40 से 50 लाख रुपए कमाने लगे। लेकिन आर्थिक रूप से पिछड़े युवाओं की सोच को जागरुक करना आसान नहीं था।

उन्होंने हार नहीं मानी व सुनियोजित रूपरेखा तैयार कर उस पर काम करने लगे। गांव में आर्थिक रूप से कमजोर लड़कों के समूह के माध्यम से मछलीपालन व मुर्गीपालन को ले प्रशिक्षित करने लगे। मुर्गीपालन के लिए निजी कंपनियों से संपर्क कराया। मछलीपालन के लिए तालाब खुदाई करने के लिए आर्थिक मदद भी दिलाई।