बैसाख पूर्णिमा को बुद्ध पूर्णिमा के रूप में क्यों मनायी जाती है.. जाने पूरी स्टोरी

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बौद्ध धर्मावलंबियों के चार प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक बोधगया प्रमुख अध्यात्मिक नगर है जहां शनिवार को पंचशील ध्वज से सजे बुद्ध भूमि बोधगया में बुद्धं शरणम… धम्म शरणम,.. और संघ शरणम गच्छामि( त्रिशरण) के जयघोष के साथ भगवान बुद्ध का 2560वीं त्रिविध जयंती मनायी जा रही है। जयंती को लेकर बौद्ध श्रद्धालुओं से बुद्धभूमि पट गई है।

शुक्रवार की संध्या बेला में अखिल भारतीय भिक्षु महासंघ के तत्वाधान में 28 वां त्रिदिवसीय अंतरराष्ट्रीय बुद्ध पूर्णिमा समारोह का कालचक्र मैदान पर वरिष्ठ भिक्षुओं ने दीप प्रज्जवलन व सूत पाठ कर शुभारंभ किया।

आप को बताते चले कि बैसाख पूर्णिमा को बुद्ध पूर्णिमा के रूप में मनायी जाती है। यह दिन खास इसलिए है कि इसी दिन बौद्ध धर्म के संस्थापक भगवान बुद्ध को बुद्धत्व प्राप्त हुआ था। आइए आज आपको बुद्ध के बारे में बताते है।

नेपाल के तराई क्षेत्र में रुक्मिनदेई नामक स्थान है। वहां एक लुम्बिनी नाम का वन था। गौतम बुद्ध का जन्म ईसा से 563 साल पहले हुआ। उस वक्त कपिलवस्तु का महारानी महामाया देवी अपने नैहर देवदह जा रही थीं, तो रास्ते में लुम्बिनी वन में ही उनका जन्म हो गया। तब इनका नाम सिद्धार्थ रखा गया। इनके पिता का नाम शुद्धोदन था। जन्म के सात दिन बाद ही मां का देहांत हो गया। सिद्धार्थ की मौसी गौतमी ने उनका पालन-पोषण किया।

बचपन से ही सिद्धार्थ के मन में दया भरी थी। उनसे किसी भी प्राणी का दुख नहीं देखा जाता था। खेल में भी सिद्धार्थ को खुद हार जाना पसंद था, क्योंकि किसी को हराने के बाद हारने वाले व्यक्ति का दुखी होना उनसे नहीं देखा जाता था।

एक बार सिद्धार्थ को जंगल में तीर से घायल एक हंस मिला। उन्होंने उस हंस को उठाकर उसे पानी पिलाया और सहलाया। तभी सिद्धार्थ का चचेरा भाई देवदत्त वहां पहुंचा और कहने लगा कि यह शिकार मेरा है। सिद्धार्थ ने हंस देने से साफ मना कर दिया और कहा कि तुम तो इस हंस को मार रहे थे। मैंने इसे बचाया है। तुम ही बताओ कि इस पर मारने वाले का हक होना चाहिए कि बचाने वाले का? आखिरकार देवदत्त ने सिद्धार्थ के पिता राजा शुद्धोदन से इस बात की शिकायत की, लेकिन अंत में पिता को भी मानना पड़ा कि मारने वाले से बचाने वाला ही बड़ा है।

एक बार उनकी नज़र एक बूढ़े पर पड़ी, फिर किसी बीमार और लाचार को देखने के बाद उन्होंने किसी मृत शरीर को ले जाते हुए देखा, जिसके बाद उन्हें जीवन से विरक्ति सी हो गई। यह सब देख उनके मुंह से निकल पड़ा धिक्कार है यहां जन्म लेने वालों पर। फिर एक दिन उनकी नज़र एक भिक्षुक पर पड़ी, जो सिर मुंडवाकर, भिक्षा-पात्र लेकर भीख मांगकर खाता था, जिसे संसार से कुछ भी लेना-देना नहीं।

फिर क्या था, ज्ञान की प्राप्ति के लिए भगवान बुद्ध घर से निकल पड़े। पत्नी यशोधरा, दुधमुंहे बेटे राहुल और कपिलवस्तु जैसे राज्य का मोह छोड़कर सिद्धार्थ तपस्या के लिए चल पड़े। वह राजगृह पहुंचे। वहां उन्होंने भिक्षा मांगी। सिद्धार्थ घूमते-घूमते आलार कालाम और उद्दक रामपुत्र के पास पहुंचे। उनसे उन्होंने योग-साधना सीखी। वहां उन्होंने समाधि लगाना सीखा, जिससे उन्हें संतोष नहीं हुआ और वह उरुवेला पहुंचकर वहां पर तरह-तरह से तपस्या करने लगे।

सिद्धार्थ ने शुरुआत में तिल-चावल खाकर तपस्या शुरू की और बाद में कोई भी आहार लेना बंद कर दिया। शरीर सूखकर कांटा हो चुका था। उन्हें कठिन तपस्या करते हुए छः साल बीत गए, लेकिन उनकी तपस्या सफल न हो सकी।

बैसाखी पूर्णिमा को सुजाता नाम की किसी स्त्री को पुत्र हुआ। उसने बेटे के लिए मन्नत मांगी थी। वह अपनी मन्नत पूरी करने के लिए खीर लेकर वटवृक्ष के पास पहुंची। उसने देखा कि सिद्धार्थ वहां ध्यान लगाए बैठे हैं। उसे लगा वृक्षदेवता ने शरीर रूप धारण कर लिया हो। सुजाता ने आदर भाव से सिद्धार्थ को खीर भेंट की और कहा- जैसे मेरी मनोकामना पूरी हुई, उसी तरह आपकी भी हो।

उसी रात को ध्यान लगाने पर सिद्धार्थ की साधना सफल हुई। उसे सच्चा बोध हुआ। तभी से वे बुद्ध कहलाए। जिस वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ को बोध प्राप्त हुआ, उसका नाम है बोधिवृक्ष। जिस स्थान की यह घटना है, वह है बोधगया।

बौद्ध-दीक्षा का मंत्र- बुद्धं शरणं गच्छामि : मैं बुद्ध की शरण लेता हूं। धम्मं शरणं गच्छामि : मैं धर्म की शरण लेता हूं। संघं शरणं गच्छामि : मैं संघ की शरण लेता हूं। इस मंत्रोचारण से पूरा गया गुंज रहा है। इस पावन अवसर पर बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद ने भी पूजा अर्चना की।

हिन्दू धर्मावलंबियों के लिए बुद्ध विष्णु के नौवें अवतार हैं। इसलिए हिन्दुओं के लिए भी यह दिन पवित्र माना जाता है। यह सत्य विनायक पूर्णिमा भी मानी जाती है।