बड़ा अलबेला है बसैठी का यह मेला!

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अररिया – यहाँ के मंदिरों का कई इतिहास है. इसमें बसैठी का भी शिव मंदिर खास है. जिला मुख्यालय से 22 किमी दूर बसैठी में सत्रहवीं सदी में स्थापित यह मंदिर आस्था का केंद्र है. 17वीं सदी में राजा, जिनका सम्पूर्ण पूर्णिया इलाके पर शासन था उसने वंश का पूरा इतिहास मंदिर के प्रवेश द्वार पर स्थित ताम्र लेख में अभी भी अंकित है. यह मंदिर मिथिला व बंगाल की मिश्रित शैली में बना हुआ है. इस मंदिर का निर्माण राजवंश की अंतिम महारानी व महाराज इंद्र की पत्नी महारानी इंद्रावती ने सन 1797 ई में करवाया था. यह मंदिर के स्थापत्य कला को पंचरत्नकार शैली की संज्ञा दी गई है.

पुराने पूर्णिया जिले के दो हजार वर्गमील की जमींदारी की मलिका महारानी इंद्रावती द्वारा निर्मित बसैठी का शिव मंदिर आध्यात्मिक प्रगति एवं मिथिला संस्कृति की कलात्मक अभिव्यक्ति है. यह रानीगंज से 10 किलोमीटर पूरब दक्षिण में यह शिवमंदिर स्थित है, जो बसैठीमठ के नाम से लोगों में आस्था का केंद्र बना हुआ है.

यहाँ लगता है भव्य मेला

महाशिवरात्रि और सावन के अवसर पर शिवभक्त दंड प्रणाम करते कई मील से आते हैं. यहाँ अनेक शुभ कार्य होते हैं. यहाँ हमेशा विवाह, संस्कार, मुंडन संस्कार होते रहते हैं. असीम आस्था के इस मंदिर परिसर में एक भव्य मेला भी लगता है. लग्न और अनेक शुभ मुहूर्त के मौके पर यहाँ हमेशा मेला लगा रहता है. शिवरात्री और सावन के महीने में तो यहाँ भक्तों का तांता लगा रहता है. सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक आस्था के इस केंद्र पर दूर-दराज से भी लोग आते हैं.

पुराना है यहाँ का इतिहास

ऐतिहासिक अभिलेख में पता चलता है कि महारानी की जमींदारी का नाम महालात परगना हवेली पूर्णिया तथा महाल खालू मोताल के सूबा नन्नितउल बुलात दर्ज है. 1784 ई.में महाराजा इंद्रनारायण राय के स्वर्गारोहन के बाद विदुषी मैथलानी विधवा महारानी इंद्रावती ने अपनी विलक्षण प्रतिभा से जमींदारी की इतनी सुंदर व्यवस्था की उसकी यश गाथा आज भी अमर है. उनका निवास तो मोहनी गढ़ में था,लेकिन मुख्यालय पहुंसरा ड्योढ़ी बसैठी से सटे पश्चिम अवशेष के रूप में आज भी जमीन के नीचे है.

कहते हैं 1795 ई.में महारानी इंद्रावती ने बाबा धाम की यात्रा से लौटने के बाद बसैठी गाँव में एक शिवालय, चन्द्रदीप कुवां तथा शिव गंगा नामक सरोवर बनाने का फरमान जारी किया था. वास्तु शास्त्र के शिल्पकारों को बुलाया गया एवं मंदिर बनाने का कार्य शुरू हो गया था. साथ ही शिवगंगा एवं चन्द्रदीप कुआँ बनाने का कार्य कुछ ही समय में पूरा कर लिया गया था. काशी के प्रख्यात शिल्पी को शिवच्लग तथा राज पंडित शुभनाथ मिश्र को प्रशस्ति पत्र तैयार करने का कार्य सौंपा गया.

प्रशस्ति पत्र के दस श्लोक ताम्र पत्र पर लिखे गये जो मंदिर के मुख्य द्वार पर आज भी चिपका हुआ है. सन 1797 ई.के फाल्गुन शुक्ल द्वितीया की शुभ तिथि को इस मंदिर में शिवच्लग की प्राण प्रतिष्ठा एक विराट याज्ञिक अनुष्ठान सैंकड़ों वैदिकों, छोटे-बड़े जमींदारों एवं हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में सम्पन्न हुआ था. इस मंदिर के गुंबद की विशेषता है कि बाहर से देखने में तीन अलग-अलग गुंबद तीन मंदिर का लगता है परन्तु अंदर जाने पर एक ही मंदिर है. प्रवेश द्वार पर लगा प्रशस्ति ताम्र पत्र में दस श्लोक जिसकी भाषा संस्कृत एवं लिपि तिरहुता है. इसमें राजा इंद्र नारायण राय की वंशावली तथा मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा की तिथि आदि का उल्लेख है.