भारत में एक पाकिस्तान जहां दिलों में बसा है हिन्दुस्तान

508
0
SHARE

पूर्णिया: उरी में आतंकी हमले और भारतीय सेना के सर्जिकल अटैक के बाद एक बार फिर सुर्खियों में आया पाकिस्तान भले ही भारत के खिलाफ आतंकवाद और अलगाववाद का जहर उगल रहा है लेकिन हिन्दुस्तान आज भी सदियों से एक पाकिस्तान को अपने दिल में बसाए हुए है। जी हां, चौंकिए नहीं हम बात कर रहे हैं देश की सरजमीं पर बसे पाकिस्तान की जहां अमन और भाईचारे के रिश्तों की नई इबारत लिखी जा रही है।

दरअसल, पूर्णिया जिला मुख्यालय से करीब बीस किलोमीटर दूर एक गांव है- पाकिस्तान। श्रीनगर प्रखंड की सिंघिया पंचायत में बसे इस गांव की नींव कब और कैसे पड़ी किसी को पता नहीं लेकिन गांव के कुछ बुजुर्ग बताते हैं कि कई दशक पहले पूर्वी पाकिस्तान के अस्तित्व में आने के बाद यह गांव धीरे-धीरे आबाद हुआ। पहले दो-चार घर थे अब तो बड़ी बस्ती है। कालांतर में यहां आदिवासी भी बड़ी संख्या में बस गये।

विकास की रोशनी से कोसों दूर टापूनुमा इस गांव का नाम भले ही पाकिस्तान हो पर यहां रहनेवाले लोगों को असली पाकिस्तान की करतूतों से पूरी तरह अनभिज्ञ हैं। उन्हें जब यह बताया गया कि पड़ोसी देश पाकिस्तान किस तरह अपने देश पर आतंकी हमला कर बेगुनाह लोगों और सैनिकों की जान ले रहा है तो उन्हें काफी दुख पहुंचा।

इस गांव के बुजुर्ग सुफोल हांसदा कहते हैं कि हम तो बहुत कुछ नहीं जानते पर इतना जरूर जानते हैं कि यह किसी सच्चे पड़ोसी का काम नहीं। एक वो हैं जो पड़ोसी की जान लेने के लिए तुले हैं और एक हम हैं जो जान देने के लिए हर वक्त तैयार रहते हैं।

स्वभाव से सरल और शांतप्रिय यहां के अधिकांश लोग मेहनत कर कमाते खाते हैं। कोई बड़ा रोजगार नहीं है। खेती जीविका का मुख्य आधार है। चार नदियों से यह घिरा गांव किसी टापू से कम नहीं। यहां न तो स्कूल है और न अस्पताल। विकास के नाम पर पहले यहां पहुंचने के लिए पगडंडी थी अब कच्ची सड़क है।

कहते हैं कि बद अच्छा बदनाम बुरा। पूर्णिया के पाकिस्तान में रहनेवाले वाशिंदों के लिए यह कहावत सटीक है। जब इस गांव का नाम पाकिस्तान पड़ा होगा तब तो शायद किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि यह नाम एक दिन आनेवाली पीढ़ियों के लिए बदनुमा दाग से कम नहीं होगा।

यहां के लोग बताते हैं कि अपना पता और ठिकाना बताने में कहीं-कहीं बड़ी परेशानी होती है। खासकर ट्रेनों के सफर और कोर्ट-कचहरी में बहुत दिक्कत होती है। पता बताने पर पुलिस वाले भी अक्सर धोखा खा जाते हैं। जब तक वे समझ पाते हैं तबतक तो काफी देर हो जाती है। सबसे बड़ी परेशानी तो शादी-व्याह में होती है। अधिकांश रिश्ते तो गांव के नाम से ही टूट जाते हैं।

#अरुण कुमार(हिन्दुस्तान)