भारत में धान की खेती से हो रहे पैदावार की श्रेणी में बिहार छठे स्थान पर – डॉ प्रेम कुमार

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पटना – आज बिहार के कृषि विभाग मंत्री डाॅ॰ प्रेम कुमार से अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (आई॰आर॰आर॰आई॰), मनीला, फिलिपीन्स के महानिदेशक डॉ॰ मैथ्यू मोरेल ने विकास भवन, नया सचिवालय, पटना स्थित उनके कार्यालय कक्ष में मुलाकात की। इस बैठक में मंत्री से डाॅ॰ मोरेल द्वारा बिहार में धान और इसकी खेती की व्यवस्था को और अधिक प्रोत्साहित करने के संबंध में चर्चा की गई।

कृषि मंत्री डाॅ॰ प्रेम कुमार ने बिहार में कृषि के संदर्भ में ईरी साऊथ एशिया रीजनल सेण्टर (आइसार्क) का महत्त्व बताते हुए कहा कि बिहार के कृषि रोडमैप के अनुसार और यह ध्यान में रखते हुए कि हमारी 76 प्रतिशत आबादी कृषि क्षेत्र पर निर्भर है, ईरी के साऊथ एशिया रीजनल सेण्टर जैसे अनुसंधान केंद्र की स्थापना से, बिहार में किसानों की आमदनी और आजीविका में सुधार लाने और खाद्य एवं पोषण सुरक्षा पाने के कार्य में सहयोग मिलेगा। बिहार सरकार के सहयोग से की जा रही इस नई शुरुआत से, ईरी, बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर, भागलपुर, कृषि विभाग और ऐसी राज्य की कई एजेन्सियों के साथ मिलकर धान की और ज्यादा सहनशील प्रभेदों और तकनीक पर विकास कार्य करेगी और इस प्रकार बिहार के किसानों और आर्थिक विकास में सहयोग देने का प्रयास करेगी।

भारत में धान की खेती से हो रहे पैदावार की श्रेणी में बिहार प्रदेश, 33 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में हो रही 71 लाख मे॰ टन की उपज सहित, छठे स्थान पर माना जाता है। किन्तु इसमें भी पैदावार मे अन्तर पाया जाता है, जहाँ भागलपुर में 1,000 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर धान की उपज प्राप्त होती है, वहीं दूसरी ओर भोजपुर में 2,000 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक की उपज संभव है। इसका एक मुख्य कारण मौसम की चरम परिस्थितियाँ, जैसे कि झुलसाने वाली गर्मी, बाढ़, सूखाड़ इत्यादि है, जो किसानों की अन्य परिस्थितियाँ, जैसे कि सिंचाई के लिए पानी की कमी और कीट प्रबंधन आदि को और गहन कर देती है।

इस स्थिति में खाद्य सुरक्षा बेहतर करने के लिए बिहार सरकार मौसम की चरम परिस्थितियों के अनुरूप सहनशील धान की प्रभेदों के विकास और किसानों की आजीविका में सुधार लाने के लिए निरंतर प्रयास कर रही है। अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (आई॰आर॰आर॰आई॰) द्वारा स्थापित वाराणसी में, ईरी साऊथ एशिया रीजनल सेण्टर (आइसार्क), इसी पथ पर हो रही प्रगति की दिशा में एक और ठोस कदम है, जिससे देश-प्रदेश और खासकर दक्षिणी एशिया में हो रहे धान और धान सम्बन्धी अनुसंधान को बढ़ावा मिलेगा। इस सेंटर में धान और धान सम्बन्धित हो रहे अत्याधुनिक अनुसंधान और नवीन खोजों पर जोर दिया जायेगा, जिनसे धान की कई नई सहनशील प्रभेदों का विकास संभव होगा, जिससे इस पर निर्भर समुदायों का भी आर्थिक और समग्र विकास और तेजी से हो पायेगा।

आइसार्क पर टिप्पणी करते हुए अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (ईरी), मनीला, फिलिपीन्स के महानिदेशक डॉ॰ मैथ्यू मोरेल ने कहा कि बिहार में उनके संस्थान के सहयोग से अधिक पौष्टिकारक चावल जिसको बायो-फोर्टिफाईड चावल कहते हैं और जिसमें जस्ता एवं लौह की मात्रा अधिक हो, को विकसित कर उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य में सुधार करना, बेहतर फसलों के विकास से उत्पादकता में बढ़ावा देना एवं किसानों के आय में वृद्वि करना, किसानों के उत्पादन लागत विशेषकर श्रम और उपादानों पर व्यय किये जाने वाले खर्च को कम करने के लिए यांत्रिकरण तथा प्राकृतिक संसाधन यथा मिट्टी, पानी तथा कीट-व्याधियों के प्रबंधन को बढ़ावा देना, अग्रणी एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर के प्रजनक तकनीकों के बारे में राज्य के शोधकत्र्ताओं और वैज्ञानिकों के ज्ञान तथा कौशल में वृद्वि और कृषि उत्पादन के अभिनव तकनीक और दृष्टिकोण पर किसान समूह विशेषकर महिलाओं के समूह का क्षमता संबर्द्धन करना सम्मिलित है। निरन्तर बढ़ती आबादी, बदलते खेती के पर्यावरण सम्बन्धी हालात, जलवायु परिवर्तन जैसी कई परिस्थितियों के चलते इस समय में आइसार्क की स्थापना सही है। अनुसन्धान एवं प्रशिक्षण के अत्याधुनिक इस सेंटर द्वारा, सरकार के समर्थन से, हमें उम्मीद है कि हम खाद्य और पोषण स्थिरता के लिए कार्य करने और उससे जुड़ी समस्याओं का हल प्रदान करने में और सफल हो पायेंगे।’’

इरी के जेंडर विशेषज्ञ डाॅ॰ सुगंधा मुंशी ने बताया कि इरी के वेबसाईट पर मुजफ्फरपुर जिला के बाॅद्रा प्रखण्ड की महिला किसानों की सफलता की कहानी है। आने वाले समय में कृषि में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए इरी द्वारा कृषि विभाग, बिहार एवं जीविका के साथ मिलकर और कार्य करेगी। आइसार्क की कुछ विशेष सुविधाएँ हैं: उसका सेण्टर फॉर राइस वैल्यू एडिशन लैब (सर्वा), जो धान की गुणवत्ता पर केंद्रित है, अन्य सुविधाएँ जो धान के पोषक तत्त्व, बायो-फोर्टिफिकेशन, फसल कटाई के बाद के प्रबंधन, धान की सहनशील प्रभेदों का विकास जैसी कई और चुनौतियों पर केंद्रित रहेंगी, जो खासकर बिहार, भारतवर्ष, दक्षिणी एशिया और अफ्रीका के लिए विकास मार्ग को सरल करेंगे।

इस बैठक में इरी के साऊथ एशिया के प्रतिनिधि डाॅ॰ नफीस, सीनियर वैज्ञानिक डाॅ॰ अरविन्द कुमार, बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर, भागलपुर के निदेशक, प्रसार शिक्षा डाॅ॰ आर॰ के॰ सोहाने, निदेशक, अनुसंधान डाॅ॰ पी॰के॰ सिंह, निदेशक, बीज एवं प्रक्षेत्र डाॅ॰ रेवती रमण, धान प्रजनक वैज्ञानिक डाॅ॰ एस॰पी॰ सिंह भी मौजूद थे।