भूख ने छीना मासूमों का बचपन

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खिलौने और काॅपी-कलम वाले हाथों में हैं, कचरे की बोरियां

रंजीत राजन

जहानाबाद- अंधेरे में जो बैठे हैं, नज़र उन पर भी कुछ डालो अरे ओ रोशनी वालों बुरे हम हैं नहीं इतने, ज़रा देखो हमें भालो अरे ओ रोशनी वालों, हमें नफरत से मत देखो जरा हम पर रहम खाओ, अरे ओ रौशनी वालों। संबंध फिल्म में महेन्द्र कपूर का ये गाया गाना आज सडकों पर कूड़ा-कचरा बीन रहे बच्चों पर सटीक बैठ रही है। दीपावली आने वाली है, और पैसे वाले अपने अपने घरों को रौशन करने में जुटे हैं पर सवाल ये है कि क्या इन बच्चों जीवन में कभी रौशनी आयेगी? क्या इनके जीवन का अंधेरा छटेगा? सबसे हैरत वाली बात तो ये है कि सरकार की कई योजनाएं सिर्फ दिखावे और समाचार पत्रों की सुर्खियों के लिए ही बनती है। इसका प्रमाण है, नीतीश सरकार की पहली पारी में सड़कों पर कूड़ा-कचरा बीनने वाले बच्चों को स्कूल में नामांकन का अभियान चला था और इसकी जिम्मेवारी स्थानीय थानों की दी गयी थी।

उस वक्त ये खबर समाचारों की सुर्खियों भी बनी थी। परन्तु समय के साथ वहीं हुआ जो अन्य कल्याणकारी योजना का होता है। सड़कों पर बच्चें आज भी कचरा बीन रहे हैं। जिन नन्हें हाथों में खेलने का खिलौना और पढ़ने को काॅपी और कलम होनी चाहिए थी। वह बचपन कचरों के बीच बर्बाद हो रहा है। इसका जिम्मेवार कौन है? मात्र उनके परिजन या शासन प्रशासन के रौशनी वाले? ये सवाल जहानाबाद की सड़को पर मलीन बस्ती के अम्बेडकर नगर के 6 और 7 साल के आनन्द और विनोद के मासूम चेहरे देखने के बाद और तीखा हो गया।

सुबह सात बजे हाथों में बोरे लेकर घर से निकल सड़कों और कूडों की ढ़ेर पर कचरा बीनने वाले विनोद और आनन्द जैसे सैकड़ो बच्चें दिन भर की मेहनत के बाद पचास से साढ़ रूपया अपने परिजनों को देते हैं। ऐसे बच्चों के परिजन अमूमन सफाईकर्मी या मलिन बस्ती में रहने वाले हीं होते हैं। बहरहाल प्रश्न यह है कि दीपावली के इस मौसम में भी सडकों पर कचड़ा बीनने वाले आंनद के जीवन में कब खुशियां आयेगी? और इनके जीवन का अंधेरा कौन दूर करेंगा?