भोजपुरी फिल्मों को लगी है छूत की बीमारी

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मनीषा प्रकाश

कहते हैं भाषा में समाज का सच दिखता है। योगसूत्र के रचनाकार पतंजलि ने भी कहा था कि भाषा का निर्माण लोक करता है। सिनेमा उस लोक का ही हिस्सा है और हर भाषा उस समाज का प्रतिनिधित्व करती है जिससे वो आती है। सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि क्या समाज और सिनेमा का कोई रिश्ता भी है या वो महज इंसान की निम्नतम इच्छाओं की पूर्ति का साधन भर है? या फिर लोग सिनेमा में देखना क्या चाहते हैं? और यह भी कि हमें सिनेमा से कितना उम्मीद करना चाहिए या फिर उम्मीद करना भी चाहिए या नहीं ?

आखिर भोजपुरी में सिनेमा बनाया ही क्यूँ जाए? जिस दिन हम ये समझ जाएंगे कि भोजपुरी सिनेमा की जरूरत क्यूं हैं, उस दिन उसके विषयवस्तु पर बहस करने की जरूरत नहीं रह जाएगी। वर्तमान में भोजपुरी सिनेमा इस दौर मैं हैं जहां मुझे नहीं लगता कि भोजपुरी समाज के लोग अपनी भाषा में बनाई जाने वाली फिल्मों से खुद को जोड़ कर देख पाते हैं। भोजपुरी सिनेमा में जो कुछ भी परोसा जा रहा है, वो कतई इस समाज का चित्रण नहीं करता। क्या सिनेमा का ये दायित्व नहीं होता कि वो उस समाज का अक्स बने जिसने उसे जन्म दिया है ? जैसे चरित्र भोजपुरी सिनेमा में दिखाए जाते हैं, क्या भोजपुरी समाज का सच वही है ? क्या इस समाज की महिलाएं वैसा ही व्यवहार करती हैं ? कभी जानेमाने अभिनेता रवि किशन ने कहा था कि भोजपुरी सिनेमा माँ के हाथों बना घर के खाने जैसा है। पर घर का खाना अब घर का खाना रहा कहाँ? रेस्तरां, ठेले-खोमचे के खाने में इस्तेमाल होने वाला घटिया सामान अब घर की रसोई में पहुंच उसे बेस्वाद बना चुका है।          

समाज का एक बड़ा हिस्सा इस सिनेमा से कोई ताल्लुक नहीं रख पाता। ये इस सिनेमा की बहुत बड़ी हार है। भोजपुरी सिनेमा आज एक खास तबके को ध्यान में रखकर बनाई जाती है। ऐसा कई कारणों से है। सबसे बड़ा कारण बाजार में बने रहने की मजबूरी है। पर इस सिनेमा का प्रसार समाज के बाकी तबके में भी हो जहां इसकी पहुंच नहीं हैं इसके लिए कोई कोशिशें नहीं हो रहीं।

मुझे याद है बचपन में “गंगा किनारे मोरा गांव” फिल्म देखी थी। इस फिल्म की पूरी कहानी तो याद नहीं पर कई हिस्से आज भी यादों में ताज़ा हैं। खास तौर पर माँ, बेटे के मिलने और बिछड़ने की कहानी। फिल्म देखते वक्त कई हिस्सों पर आंसू निकले ये भी याद है। पर वैसी फिल्में दोबारा मैंने नहीं सुना की आई भीं। भोजपुरी फिल्मों से मोंह भंग हो गया था। हिन्दी फिल्मों पर आधारित रिमेक बनने लगे। नाम भी अनाप-शनाप रखा जाने लगा। फिर अचानक कई सालों बाद गंगा किनारे मोरा गांव के अभिनेता कुणाल से मुलाकात हुई। काफी लंबी बातचीत हुई। कई मुद्दों पर बहस हुई। भोजपुरी फिल्मों के उत्थान और पतन तक चर्चा हुई। पतन लिखना इसलिए जरूरी है क्यूंकि इसका स्तर दिनोंदिन गिरता ही जा रहा है। कुणाल ने दो अर्थ से भरे संवाद वाली फिल्मों से किनारा कर लिया।

सैद्धान्तिक या नैतिकता के स्तर पर भोजपुरी फिल्मों में अब यह साफ हो चुका है कि साफ-सुथरी फिल्में बनाने की कोई गुंजाइश नहीं। आईटम सॉंग के बगैर फिल्म का चलना तो नामुमकिन है। गानों की बात ना करें तो अच्छा है। पुराने दौर के निर्माता और निर्देशक भी नहीं रहे जिन्होंने “गंगा मैंया तोहे पियरी चढ़ैबो” और “धरती मैया” जैसी फिल्मों को अमर बनाकर भोजपुरी फिल्मों को चोटी तक पहुंचाया। पर अब किसी निर्माता-निर्देशक में ऐसी फिल्में बनाने कि कुवत्त नहीं है और अगर हिम्मत है भी तो खुले बाज़ार के दौर में सड़ी-गली फिल्म बनाकर पैसे बटोरने की चाहत ने अंधा बना दिया है।

सिर्फ निर्माता-निर्देशकों को दोष देना भी ठीक नहीं। अगर निर्माता हिम्मत भी कर ले और उसे दर्शक भी ना मिले तो ऐसी फिल्में बनाने का क्या औचित्य? मैंने आज तक नहीं सुना कि किसी भी भोजपुरी फिल्म को मल्टीप्लेक्स या बड़े सिनेमाघरों में जगह दी गई। हर शहर में एक सिनेमा हॉल निर्धारित है जहां सिर्फ भोजपुरी फिल्में ही लगेंगी। यह भी तय कर देता है कि किस तरह के दर्शक इस सिनेमा हॉल में आएंगे और कौन से दर्शक ऐसे सिनेमा हॉल में जाने वाले भोजपुरी सिनेमा प्रेमियों को अछूत समझेंगे। अब तक दलितों को ही अछूत माना जाता था। बाद के दौर में राजनीतिक पार्टियां भी अछूत होने लगीं। ऐसे में भोजपुरी फिल्म को एक खास वर्ग द्वारा अछूत समझना क्या गलत नहीं होगा?

सवाल ये उठता है कि कम बजट में अच्छी फिल्में बनाना सम्भव तो है लेकिन दर्शकों को लुभाने के लिए आने वाला खर्च यानी प्रचार-प्रसार का खर्च कौन उठाएगा ? भोजपुरी बोलने वालों में ही एक बड़ा तबका ऐसा है जो ये फिल्में देखना तो चाहता है लेकिन परिवार के साथ या सिनेमाघर में जाकर नहीं। निर्माता-निर्देशकों ने भी ये मान लिया है कि फिल्में वैसे दर्शकों के लिए ही बनाना है जो ऐसे सिनेमा हॉल में आना पसन्द करते हैं।