भोजपुरी लोक गीतों में सावन

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१. सखि हो काली बदरिया रात
देखत निक लागे ए हरी
गड़ गड़ गरजै, चम चम चमकै,
सखि हो झम झम बरसै न
२.”नथिया का कारन हरि, मोरे उतरि गईले पार
रतियाँ सेजिया ही अकेली दिनवां बतियों ना सोहाई.
एकत राति हो बड़ी है, दूसरे सैयां बिछूड़ी,
तीसरे सावन के महीनवां झम झमकावै बदरी. ”
३.हरि हरि बाबा के सगरवा मोरवा बोले ए हरि,
मोरवा के बोलिया सुनि के जीयरा उचटले-
हरि हरि कहद बाबा हमरो गवनवां ए हरी.”
४.हरि हरि सइयां अनारे के फूल देखत निक लागे ए हरी. ”
” हरि हरि सोव सवती के साथ बलमु कुम्भिलाने ए हरी.””