महात्मा गांधी के चम्पारण सत्याग्रह के सौ साल

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गांधी का चम्पारण फिर से अतित को जीवंत करने की कोशिश मे लगा हुआ है। 16 अप्रैल 1917 को मोतिहारी की धरती पर पड़े महात्मा गांधी के कदम मानो अंग्रेज शासकों के छाती पर पड़े हो। अंग्रेज जमींदारों के जुल्म और आतंक की कहानी सुनकर चंपारण आने वाले महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलनकारियों को सत्याग्रह का ऐसा अस्त्र दिया कि अंग्रेज शासकों को अपनी चुले हिलती हुई नजर आयी। भारत की आजादी का अमोघ अस्त्र बने महात्मा गांधी के सत्याग्रह के सौ साल पूरा होने के उपलक्ष्य में चम्पारण के साथ पूरा देश चम्पारण सत्याग्रह शताब्दी समारोह के रंग मे रंगा हुआ नजर आया। महात्मा गांधी की कर्मभूमि चम्पारण में उनके आगमन के 100 वर्ष पुरे होने पर चम्पारण वासी के साथ-साथ पूरा देश चम्पारण सत्याग्रह शताब्दी समारोह मना रहा है। भारत कृषि प्रधान देश है। अंग्रेजों के शासन काल में किसानों पर हो रहे अत्याचार को देखते हुए पंडित राजकुमार शुक्ल के आग्रह पर महात्मा गांधी 15 अप्रैल 1917 को रेल से मोतिहारी पहुंचे। अंग्रेजी हुकूमत चम्पारण के किसानों को तीन कठ्ठे में नील की खेती करने को विवश करते थे। जिसे तीन कठईया कानून कहा जाता था। जो किसान नील की खेती करते थे उनकी वो जमींन बंजर हो जाती थी।

हजारों भूमिहीन मजदूर एवं गरीब किसान खाद्यान के बजाय नील और अन्य नकदी फसलों की खेती करने के लिये बाध्य हो गये थे। वहां पर नील की खेती करने वाले किसानों पर बहुत अत्याचार हो रहा था। अंग्रेजों की ओर से खूब शोषण हो रहा था। ऊपर से कुछ बगान मालिक भी जुल्म ढ़ा रहे थे। गांधीजी किसानों पर हुए अत्याचार की स्थिति का जायजा लेने मोतिहारी से जसौलीपट्टी जा रहे थे। उसी दौरान अंग्रेजी हुकूमत ने चंद्रहिया गावं के पास आगे जाने पर रोक लगा दी। उनके दर्शन के लिए हजारों लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। किसानों ने अपनी सारी समस्याएं बताई। उधर पुलिस भी हरकत में आ गई। पुलिस सुपरिटेंडेंट ने गांधीजी को जिला छोड़ने का आदेश दिया। गांधीजी ने आदेश मानने से इंकार कर दिया। अगले दिन गांधीजी को कोर्ट में हाजिर होना था। हजारों किसानों की भीड़ कोर्ट के बाहर जमा थी। गांधीजी के समर्थन में नारे लगाये जा रहे थे। हालात की गंभीरता को देखते हुए मेजिस्ट्रेट ने बिना जमानत के गांधीजी को छोड़ने का आदेश दिया। लेकिन गांधीजी ने कानून के अनुसार सजा की मांग की।

फैसला स्थगित कर दिया गया। इसके बाद गांधीजी फिर अपने कार्य पर निकल पड़े। अब उनका पहला उद्देश लोगों को ‘सत्याग्रह’ के मूल सिद्धातों से परिचय कराना था। उन्होंने किसानो को स्वतंत्रता प्राप्त करने की पहली शर्त डर से स्वतंत्र होना बताया। गांधीजी ने अपने कई स्वयंसेवकों को किसानों के बीच में भेजा। यहां किसानों के बच्चों को शिक्षित करने के लिए ग्रामीण विद्यालय खोले गये। लोगों को साफ-सफाई से रहने का तरीका सिखाया गया। चंपारण के इस गांधी अभियान से अंग्रेजी सरकार परेशान हो उठी। सारे भारत का ध्यान अब चम्पारण पर था। सरकार ने मजबूर होकर एक जांच आयोग नियुक्त किया, गांधीजी को भी इसका सदस्य बनाया गया।। परिणाम सामने था। कानून बनाकर सभी गलत प्रथाओं को समाप्त कर दिया गया। जमींदार के लाभ के लिए नील की खेती करने वाले किसान अब अपने जमीन के मालिक बने। गांधीजी ने भारत में सत्याग्रह की पहली विजय का शंख फूंका। चम्पारण ही भारत में सत्याग्रह की जन्म स्थली बनी।