मानव जाति की प्रारंभिक रचनात्मक कला का उत्सव शैल चित्र कला

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पटना – बिहार संग्रहालय, पटना अपने सहकारिता प्रोग्राम के तहत इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (IGNCA) नई दिल्ली के सहयोग से बिहार संग्रहालय के अस्थायी दीर्घा में विश्व शैलचित्र कला (विषय) पर आधारित एक प्रदर्शनी का आयोजन कर रहा है। प्रदर्शनी इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र की राष्ट्रीय परियोजना शैल चित्रकला का एक भाग है जो विद्यालय के बच्चों, महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय के छात्रों तथा आम जनमानस के मध्य मानवजाति के इस प्रारंभिक रचनात्मक कला के विषय में सूचना एवं जागरूकता प्रदान करती है। विश्व के शैलचित्र मानवीय प्रयासों की रोचक गाथा है, जिनके द्वारा मानव ने अपने सौंदर्य बोध को वास्तविक रूप देने का प्रयास किया। स्मरणातीत काल से प्रारंभिक मनुष्य ने अपने आस-पास के संसार को संकलित करना प्रारंभ कर दिया और मानव सभ्यता के संस्मरण के लिए अपने क्रिया-कलापों को ऐसी दिशा देना भी प्रारंभ कर दिया जिससे उसकी आगे आने वाली संतती और भी समृद्धशाली हो।

जिन प्राकृतिक कन्दराओं और आश्रयणियों में उन्होंने निवास किया उन्हें चित्रों और नक्काशियों से सजया-संवारा। उनके रूपांक नों की विषयवस्तु वही बनें जिनका उन्होंनें अपने चारों ओर की प्रकृति एवं जीवन में अवलोकन किया। यह प्रागैतिहासिक कला प्राचीन लोगों के अंतर्निहित दार्शनिक पक्षों एवं वैश्विक दृष्टि को प्रकट करता है तथा हमें समुदाय की आत्मा उसके विचार विश्वास एवं भावनाओं के विषय में जानकारी प्रदान करता है। इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र आदि दृश्य विभाग के परियोजना के निदेशक डा॰ वंशी लाल मल्ला ने बताया कि विद्वानों द्वारा अनुमानित उच्च परिपक्वता वाले ये रिकार्ड चालीस हजार पूर्व प्राचीन तक जा सकते हैं।

भारत में प्रागैतिहासिक शैलचित्र सर्वप्रथम खोज स्पेन के आल्त मीरा की खोज के 12 वर्ष पहले ही पूर्व Archibald Carlleyle द्वारा उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिला के सोहागीघाट से शैलचित्रों को 1867 ई॰ में की जा चुकी थी। पूर्व क्षेत्र में मुख्यतः बिहार, झारखण्ड एवं उड़ीसा से शैलचित्रों से प्राप्ति होती है। बिहार के शैलचत्रि कला परम्परा विशिष्ट चित्रांकन परम्पराओं द्वारा चिहिृत की जाती है। ये परम्परा कैमूर जिले के विंध्यन क्षेत्र में और बिहार, झारखण्ड राज्य के सीमावर्ती नवादा जिले से प्राप्ति है।

इस संदर्भ में संभवतः दूसरी परम्परा को झारखण्ड के पहले से ही शैलचित्र कला परम्परा के उत्तेरोत्तर विस्तार के रूप में माना जा सकता है। इसके अतिरिक्त जमुई जिला से भी चित्रित शैलाश्रयों की प्राप्ति हुई है। उपरोक्त दोनों परम्पराओं वाले शैत्रचित्र गया एवं गोपालगंज जिलों से भी प्रकाश में आए हैं। पूर्वी भारत को शैलचित्र कला मुख्यतः दक्षिण बिहार और झारखण्ड के आस-पास अलग-अलग विषयगत प्रेरक एवं शैलीगत लक्षणों का प्रसार दिखायी पड़ता है। स्वयं में यह अन्य शैलचित्र कला के क्षेत्रों, मुख्यतः मध्य भारत की शैलचित्र कला से अलग है। यहाँ अन्य शैलचित्र कला क्षेत्रों के विपरीत विषय वस्तु में प्रमुख रूप से प्रतीकों, ज्यामितीय संकेतों, जटिल संरचनाओं एवं कर्मकांडीय दृश्य होते हैं।

हम सभी जानते हैं कि पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के निधनोपरांत बिहार सरकार के आदेशानुसार राज्य में सप्ताहिक शोक मनाया जा रहा है। अतः कार्यक्रम का औपचारिक उदघाटन समारोह का आयोजन नही किया जा सकेगा परन्तु इस प्रदर्शनी को प्रोफेसर डॉ. रास बिहारी प्रसाद सिंह, कुलपति, पटना विश्वविद्यालय पटना तथा डाॅ॰ उमेश चन्द्र द्विवेदी, पूर्व निदेशक, संग्रहालय, बिहार की उपस्थिति में 18 अगस्त 2018 को अपराह्न 5:00 बजे से आम दर्शकों के लिए खोल दी जायेगी। इस प्रदर्शनी के साथ दो विशिष्ठ व्याख्यानों का भी आयोजन किया जा रहा है जिसमें दिनांक 18 अगस्त 2018 के अपराह्न 5:30 बजे से प्रोफेसर वी॰ एच॰ सोनावने द्वारा राॅक आर्ट आॅफ इंडिया विद इम्फेसिस आॅन इस्टर्न इंडिया पर और 19 अगस्त, 2018 को अपराह्न 5:30 बजे से प्रो॰ आर॰ के॰ चट्टोपध्याय द्वारा प्रि-हिस्ट्री आॅफ इस्टर्न इंडिया विषय पर विशेष व्याख्यान अभिविन्यास रंग (थियेटर) में दिया जाएगा। कार्यक्रम के साथ-साथ विद्यालयों के बच्चों के लिए दो-दिवसीय शैल चित्र कला बाल कार्यशाला का आयोजन बहुप्रयोजन कक्ष में 18 एवं 19 अगस्त, 2018 को अपराहृ 03ः00 बजे आयोजित किया जाएगा।