मानव समाज में गांधी जी के विचारों की हत्या कभी नहीं की जा सकती :- मुख्यमंत्री

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पटना:- मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आज ज्ञान भवन, सम्राट अशोक कन्वेंशन केन्द्र में गांधी कथावाचन एवं बापू आपके द्वार कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलित कर किया। इस अवसर पर समारोह को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि आज लोकनायक जय प्रकाश नारायण का जन्मदिन है। हमलोग चंपारण सत्याग्रह का शताब्दी समारोह मना रहे हैं। 10 अप्रैल 1917 को महात्मा गांधी पटना आए थे। उस वक्त हमारा देश गुलाम था। 1750 में ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रवेश व्यापार के लिए हुआ था। धीरे-धीरे कंपनी ने लाभ कमाया और अपना जाल पूरे देश में फैलाया। फूट डालो और राज करो की नीति को अमल में लाकर वे राज करने लगे। अंग्रेजी हुकूमत ने 1857 के विद्रोह के बाद बकायदा अपने कब्जे में शासन को लिया और 200 वर्षों तक भारतीयों को गुलाम बनाए रखा। आजादी के लिए अनेक नायकों द्वारा संघर्ष किया गया लेकिन अंत्तोगत्वा बापू के नेतृत्व में अहिंसा एवं सत्याग्रह के जरिए अंग्रेजों को देश छोड़ना पड़ा।
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मुख्यमंत्री ने कहा कि गांधी जी कैसे अपने साधारण जीवन से सबक लेते हुए सत्य के मार्ग को अपनाया, स्कूली जीवन में एक बार शिक्षा विभाग के इंस्पेक्टर स्कूल में जांच के लिए आए थे। सभी बच्चों ने शुद्ध लिखा, सिर्फ गांधी जी के शब्दों में अशुद्धि थी, उनके स्कूल के शिक्षक ने उन्हें शुद्ध करने के लिए नकल का इशारा किया, शिक्षक का सम्मान करने के बावजूद उन्होंने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। छात्र जीवन में भी उन्होंने गलत नहीं किया। छात्र जीवन से ही इसकी शुरुआत की, पढ़ने-लिखने के बाद गांधी जी इंग्लैंड गए, बैरिस्टर बनकर आए। मुंबई के कोर्ट में हाजिर हुए, ठीक से बहस नहीं कर पाए, वहां से निकल गए और राजकोट चले गए। उनके ही इलाके के कुछ लोग दक्षिण अफ्रीका में रहते थे, उनका मुकदमा चल रहा था। गांधी जी एक साल के कॉन्ट्रैक्ट पर साउथ अफ्रीका वकालत के लिए चले गए लेकिन वहां जाने के बाद उनके जीवन में बड़ा बदलाव आया। कोर्ट में गए थे पगड़ी पहनकर, उतारने के लिए कहा, उससे उन्होंने इन्कार कर दिया और बाहर निकल गए।

दक्षिण अफ्रीका में गांधी जी अच्छे वकील के रुप में प्रतिष्ठित हुए। मुख्यमंत्री ने कहा कि दक्षिण अफ्रीका में काले-गोरे का बहुत भेदभाव था, नस्लवाद था, हिंदुस्तानियों को लोग कुली समझते थे, ट्रेन के फस्ट क्लास के टिकट पर एक बार गांधी जी यात्रा कर रहे थे तो गोरे ने शिकायत की। टी0टी0ई0 ने उन्हें बाहर जाने के लिए कहा, जिसे अस्वीकार करने पर उन्हें और उनके सामान को बाहर फेंक दिया गया। इस घटना का बहुत बड़ा प्रभाव उनके जीवन पर पड़ा, इसके बाद उनके जीवन में बहुत बड़ा परिवर्तन आया। उन्होंने कहा कि इस घटना के बाद गांधी जो को मालूम हुआ कि बहुत बड़ा भेदभाव, मजदूरों के साथ, व्यापारियों के साथ और सामान्य लोगों के साथ हो रहा है। उन्हें वोट का अधिकार नहीं था, शादी-शुदा के रजिस्ट्रेशन के बावजूद उन्हें अवैध ठहराया जाता था। लोगों को गांधी जी ने गोलबंद किया, अहिंसा के रास्ते पर चलते हुए वहीं से सत्याग्रह की उन्होंने शुरुआत की। गांधी जी कई बार जेल भी गए लेकिन वहां सत्याग्रह का प्रयोग सफल रहा। वहां के भेदभाव वाले कानून वापस लिए गए, लगभग 20 साल तक गांधी जी वहीं रहे।

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मुख्यमंत्री ने कहा कि गांधी जी जब वापस भारत आये तो गोखले साहब ने उन्हें देश भर में घूमने को कहा, एक बार मालवीय जी ने
उन्हें बनारस में भाषण के लिए बुलाया, जिसमें उनकी वाहवाही हुई। चंपारण में नील की खेती होती थी, नीले रंग की मांग यूरोप में ज्यादा थी, यहां जमींदारों की हालत बहुत खराब थी, जिसके चलते अपने गांव का गांव यूरोपी व्यापारियों के हाथ बेच दिया। किसानों के साथ उत्पादन के लिए एक बिगहा में तीन कट्ठे की नील की खेती अनिवार्य था। नील का रेट तय था, अनेक प्रकार के टैक्स लगाये गये थे, करीब 44 प्रकार के टैक्स लगाए गए थे। राजकुमार शुक्ल एवं पत्रकार मुनीष शाह जो वहीं के थे हमेशा लिखते थे। शुक्ल ने कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में भी अपनी बात रखी थी।

गांधी जी से शुक्ल ने चंपारण चलने के लिए आग्रह किया। गांधी जी कलकत्ता जाने के बाद 10 अप्रैल 1917 को पटना आए। पटना के प्रसिद्ध वकील डॉ. राजेंद्र बाबू के यहां गए। उनके घर पर नहीं रहने के कारण ठीक से उनका स्वागत नहीं हुआ, तब उनके एक वकील मित्र मौलाना मजहरुल हक साहब घर पर लेकर गए। 10 अप्रैल को ही राजकुमार शुक्ल के साथ मुजफ्फरपुर गए। वहां लंगट सिंह कॉलेज में कृपलानी जी पढ़ाते थे, वे अपने छात्रों के साथ रात को रेलवे स्टेशन पर स्वागत के लिए आए। छात्र लोग उत्साह में गाड़ी को खुद ही खींचकर ले जा रहे थे। जो गांधी जी को अच्छा नहीं लग रहा था। गांधी जी मुजफ्फरपुर में 3-4 दिन रुककर सब बातों को समझे, नीलहों के सेक्रेटरी, तिरहुत के कमीश्नर से मिले लेकिन उनका व्यवहार ठीक नहीं था। इन्हें बाहरी आदमी कहते थे। उन्होंने कहा मैं यहीं का हूं और यहां के हालात को जानने के लिए आया हूॅ।
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मुख्यमंत्री ने कहा कि गांधी जी 15 अप्रैल को मोतिहारी गए। किसानों पर अत्याचार को जानने के लिए, सुबह हाथी पर निकले उसी दौरान उन्हें पहली गाड़ी से चंपारण छोड़ने का नोटिस मिला। उन्होंने नोटिस के आदेश को मानन से इनकार कर दिया, फिर 18 अप्रैल को कोर्ट में पेशी हुई। सारे वकील गांधी जी के साथ हुए। कोर्ट में गाॅधी जी ने वक्तव्य दिया कि धारा 144 का आदेश मंजूर होने के बावजूद मैंने जान बुझकर इसे तोड़ा है, अपने अंतरआत्मा के कहने पर इस कानून को तोड़ा है। मैं अपने अंदर की आवाज को नहीं अस्वीकार कर सकता। मैं अपना बचाव नहीं कर रहा हूं, मुझे जो सजा देनी है दे दी जाए।

मजिस्ट्रेट ने निजी मुचलके पर छोड़ने के लिए कहा, इसके बावजूद उन्होंने नहीं माना और कहा कि आगे काम जारी रखेंगे और चंपारण नहीं छोड़ूंगा। चंपारण सत्याग्रह चला, अंग्रेजों को मुकदमा वापस लेना पड़ा। जिला मजिस्ट्रेट ने सहयोग करने का आश्वासन दिया। गांधी जी लोगों से मिलकर उनका बयान दर्ज किये। अंग्रेजी हुकूमत को कमिटी बनानी पड़ी और चंपारण एग्रेरियन एक्ट से तिनकठिया प्रणाली से छूटकारा मिल गया और 1918 में तिनकठिया खत्म करने के कानून को लागू कर दिया गया। जो सारे वकील साथ थे, वो काफी रईस की जिंदगी जीते थे। सबका अलग-अलग खाना बनता था। जब गांधी जी उनके साथ थे तो उन्होंने इसमें सुधार लाते हुए एक साथ भोजन की व्यवस्था कर आपस में एकरुपता लाया और सादे जीवन के लिए सबको प्रेरित किया। उन्होंने चंपारण में कुऐं, रास्ते, घर में सभी जगह काफी गंदगी देखी, पढ़ने का कोई इंतजाम नहीं, स्वास्थ्य की स्थिति भी काफी दयनीय था।

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इस क्षेत्र में गांधी जी ने वहां काफी काम किया। शिक्षा के लिए छह स्कूल खोले, पहला बड़हरवा लखनसेन स्कूल बनाए, जहां मुझे भी जाने का अवसर मिला है। भितिहरवा में तो कस्तुरबा गांधी खुद रही थीं। किसानों की समस्या का सिर्फ समाधान ही गांधी जी ने नहीं किया बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा एवं सफाई के लिए लोगों को काफी प्रेरित किया। गांधी जी का ही कमाल था कि 30 वर्ष के अंदर देश को 1947 में आजादी मिल गई। गांधी जी ने अपनी अंर्तआत्मा की आवाज पर काम किया, सदभावना को प्रश्रय दिया, उनके काम का जनमनास पर खूब प्रभाव पड़ा। बंटवारे के समय सांप्रदायिक उन्माद के दौरान भी उन्होंने काफी चीजों को झेलते हुए अनशन किया। वे अपना काम करते रहे, उनकी तो हत्या हो गई लेकिन उनके विचारों की हत्या नहीं हो पाएगी।

मुख्यमंत्री ने कहा कि गांधी शताब्दी सत्याग्रह समारोह हमलोगों ने मनाना शुरु किया है। 10 अप्रैल को राष्ट्रीय विमर्श के लिए देश से कई विचारक आमंत्रित किए गए थे। इसी क्रम में हमलोगों ने 17 अप्रैल को स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मानित किया। 11 अप्रैल से पदयात्रा किए, इसी दौरान पंडित राजकुमार शुक्ल के उजड़े घर को भी देखने का मौका मिला। गांधी जी के विचारों को जन-जन तक पहुंचाया जायेगा। लोगों को जागृत किया जायेगा। अगर गाॅधी जी के विचारों के प्रति लोगों के मन में आकर्षण पैदा हो जाए तो कितना परिवर्तन हो जाएगा। उन्होंने कहा कि हर स्कूल में गांधी जी पर कथा वाचन से बच्चों पर अच्छा प्रभाव पड़ेगा। उनका जीवन ही उनका संदेश है। जो किया, जो कहा उसे करके दिखाया। ये नई पीढ़ी जान जाए तो उनका जीवन सार्थक हो जाएगा। उन्होंने कहा कि एक-एक दिन कथावाचन होने से बहुत अच्छा प्रभाव पड़ेगा। आज का दिन लोकनायक जय प्रकाश नारायण जी का जन्मदिन है, इसके शुरुआत के लिए बहुत अच्छा मौका है। घर-घर बापू के विचार, “बापू आपके द्वार’’ का विमोचन के बाद लोगों तक पहुंचेगा।

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इसमें विचार को कार्यकर्ताओं द्वारा लोगों को घर-घर तक बताएंगे। सात सामाजिक बुराईयां सिद्धांत रहित राजनीति, बिना मेहनत के धन कमाना, विवेक रहित सुख, चरित्र शून्य ज्ञान, सदाचार रहित व्यापार, संवेदना रहित विज्ञान, वैराग विहीन उपासना इनसे बचने की सलाह गांधी जी ने दिया है। इनसे बचो, खुद से करो। मौलिक विचार कर्म पर आधारित होनी चाहिए. “माई एक्सपेरिमेंट वीथ ट्रूथ” पुस्तक में गांधी जी ने बताया है कि मेरा जीवन ही मेरा संदेश है।

इनकी मूर्ती लगाकर भगवान समझने के बदले आम इंसान समझकर हमें उनके बताए संदेश को अपनाकर सबक लेना चाहिए। मेरा मानना है कि अगर 10 से 15 प्रतिशत लोग इससे प्रभावित हो जाएं तो बिहार के साथ-साथ पूरा देश बदलेगा। चम्पारण सत्याग्रह के सौवें वर्ष में अप्रैल 2016 में उनके विचारों के प्रति प्रतिबद्धता जताते हुए शराबबंदी लागू की गई। यह एक बहुत बड़ी सामाजिक परिवर्तन की बुनियाद रखी गई। घरेलू हिंसा में कमी, महिला और बच्चों में प्रसन्नता, आर्थिक बचत हुई। शराब पीना एवं शराब का व्यापार करना मौलिक अधिकार नहीं है, यह कोर्ट का भी मानना है।

शराब और नशामुक्ति के लिए 21 जनवरी 2017 को मानव श्रृंखला बनी जिसमें 4 करोड़ लोगों ने हिस्सा लिया। यह लोगों की भावना का प्रकटीकरण था। कानून तो बना है लेकिन सावधानी रखनी है। अभियान चलाना है और आगे बढ़ना है। गांधी जी की विचारों के प्रति प्रतिबद्ध होते हुए बाल विवाह एवं दहेज प्रथा से छूटकारा के लिए हमलोगों ने अभियान चलाया। हमारे यहां 39 प्रतिशत बाल विवाह है, कम उम्र में शादी अज्ञानता के कारण होती है, महिलाओं में अनेक तरह की समस्याएं पैदा होती हैं। बच्चे बौनेपन के शिकार होते हैं। महिला अपराध में बिहार 26 वें स्थान पर है लेकिन दहेज उत्पीड़न में दूसरे नंबर पर है। जिसे इन कुरीतियों को दूर कर अच्छी स्थिति प्राप्त की जा सकती है। 2 अक्टूबर से चलाए गए यह सशक्त अभियान उनके विचारों पर चलने का सही कदम है।

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मुख्यमंत्री ने कहा कि हमलोगों ने विकेंद्रीकरण को अपनाते हुए गांव तक विकास पहुंचाया, पर्यावरण के प्रति सजग रहने की जरुरत है, जिससे आने वाली पीढ़ी को अच्छा वातावरण दे सकें। गांधी जी ने भी कहा था कि पृथ्वी इंसान की हर जरुरत पूरा करने में सक्षम है, लालच को नहीं। हमारी प्रतिबद्धता है, हमारा प्रयास होगा उनके विचारों पर अमल करने का।

उन्होंने कहा कि आज ही सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में आईपीसी की धारा 375 (2) को असंवैधानिक घोषित कर दिया गया है, जिसके तहत 15 से 18 वर्ष तक की लड़कियों के साथ संबंध बनाए जाने पर उसे बलात्कार माना जाएगा। यह निर्णय हमारे बाल विवाह अभियान में बहुत बड़ा मददगार साबित होगा। जन जन तक गांधी जी के विचारों को पहुंचाना है, जिससे सामाजिक परिवर्तन और बहुत सकारात्मक बदलाव आएगा।

मुख्यमंत्री ने इस कार्यक्रम के आयोजन के लिए शिक्षा विभाग को शुभकामना दी। मुख्यमंत्री ने कहा कि बुलंदी से बढ़िए, सत्य एवं अहिंसा को अपनाईये। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने दो कहानियों का वाचन भी किया। कार्यक्रम की शुरूआत में मुख्यमंत्री ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी एवं लोकनायक जयप्रकाश नारायण के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। समारोह के पश्यात मुख्यमंत्री ने पंगत में बैठकर बच्चों के साथ भोजन किया।

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इस अवसर पर उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी, शिक्षा मंत्री कृष्णनंदन प्रसाद वर्मा, आई0 टी0 एम0 विश्वविद्यालय ग्वालियर के कुलाधिपति रमाशंकर सिंह, विचारक एवं लेखक सोपान जोशी ने भी समारोह को संबोधित किया। इस अवसर पर लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण मंत्री विनोद नारायण झा, भवन निर्माण मंत्री महेश्वर हजारी, समाज कल्याण मंत्री कुमारी मंजू वर्मा, मुख्य सचिव अंजनी कुमार सिंह, शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव आर0के0 महाजन, मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव चंचल कुमार, मुख्यमंत्री के सचिव अतीश चंद्रा एवं मनीष कुमार वर्मा सहित शिक्षा विभाग के वरीय अधिकारी, गणमान्य व्यक्ति एवं बड़ी संख्या में बच्चे उपस्थित थे।