मोहब्बत ऐसी कि चीर दिया पहाड़ का सीना

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“जिंदगी में तो सभी प्यार किया करते है, मर कर भी मेरी जान तुझे चाहुंगा” ऐसा ही एक प्यार बिहार में इतिहास बन गया। ऐसी मोहब्बत जिसके लिए पहाड़ का सीना फाड़ कर रास्ता बना देते है। हां आपने सही समझा मैं उस मजदूर माउंटेन मैन की बात कर रहा हूं जिसने जिसने एक छेनी-हथौड़े की मदद से पहाड़ को काटकर उसके बीच रास्ता बना दिया।

आज उसी माउंटेन मैन यानि दशरथ मांझी की पुण्यतिथि है। आज पूरा बिहार उन्हें नमन कर रहा है। गेहलौर की घाटियों में आज भी दशरथ मांझी के छेनी-हथौड़े की ठक-ठक की आवाज का एहसास होता है।

ये प्यार की अनोखी दास्तां है, एक मामूली से मजदूर दशरथ मांझी की, जिसने अपने हाथों से उस पहाड़ का सीना चीर कर रख दिया जो उसकी मोहब्बत की राह में आ खड़ा हुआ था और जिसकी वजह से उनकी प्रियतमा की मौत हो गई थी। उसी दिन उन्होंने संकल्प लिया कि इस कठोर पहाड़ को काटकर इसके बीच आने-जाने का रास्ता बना देंगे कि फिर भविष्य में किसी प्यार करने वाले को एक-दूसरे से बिछड़ना ना पड़े।

दशरथ मांझी ने गहलौर घाटी में 1960 से लेकर 1982 तक पहाड़ को छेनी और हथौड़ी से काटते रहे। दशरथ रोज घर से सुबह निकलते और शाम को पहाड़ी से घर आते। देखने वाले लोग दशरथ को पागल कहने लगे, लेकिन दशरथ मांझी जिद्दी थे। जो मन में ठान लेते थे वह कर के मानते थे। 22 साल में पहाड़ को काटकर दशरथ ने 25 फीट ऊंची, 30 फीट चौड़ी और 360 मीटर लंबी सड़क बना डाली।

दशरथ मांझी के हथौड़े ने पहाड़ को दो हिस्सों में बांट दिया। पच्चीस फुट ऊंचा पहाड़ दशरथ मांझी के हौसले के आगे हार गया। मांझी ने 30 फुट चौड़ी और 365 फुट लंबी सड़क पर अपनी विजय गाथा लिख दी।

दशरथ की आंखों के सामने गहलौर और अस्पताल के बीच खड़े जिद्दी पहाड़ की वजह से साल 1959 में उनकी बीवी फाल्गुनी देवी को वक्त पर इलाज नहीं मिल सका और वो चल बसीं। अपनी प्रिया, अपनी पत्नी को आंखों के सामने मरता देख दशरथ ने तय किया कि अब इस पहाड़ पर रास्ता बनाकर रहेंगे।

दशरथ मांझी बिहार के गया जिले में 1934 में पैदा हुए थे। उनकी शादी बचपन में ही हो गई थी। लेकिन दशरथ मांझी की मोहब्बत तब परवान चढ़ी जब वो 22 साल की उम्र में यानी 1956 में धनबाद की कोयला खान में काम करने के बाद अपने गांव वापस लौटे और गांव की एक लड़की से उन्हें मोहब्बत हो गई। लेकिन किस्मत देखिए ये वही लड़की थी जिससे दशरथ मांझी की शादी हुई थी। दशरथ मांझी ने ये पहाड़ तोड़ने का फैसला अपनी उसी मोहब्बत यानी फाल्गुनी के लिए किया था।

पत्नी के चले जाने के गम से टूटे दशरथ मांझी ने अपनी सारी ताकत बटोरी और पहाड़ के सीने पर वार करने का फैसला किया। लेकिन यह काम इतना आसान नहीं था। शुरुआत में उन्हें पागल तक कहा गया। दशरथ मांझी ने बताया था, ‘गांववालों ने शुरू में कहा कि मैं पागल हो गया हूं, लेकिन उनके तानों ने मेरा हौसला और बढ़ा दिया’।

दशरथ मांझी ने जिस पत्नी के लिए पहाड़ तोड़ने का करिश्मा किया था वो उसे देखने के लिए जीवित नहीं थी। प्यार की अमर निशानी इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गयी थी और आज भी लोग उस अमर प्रेम कथा का जिक्र करते हैं। आज भी गेहलौर की पहाड़ियों से गुजरते हुए दशरथ मांझी और फाल्गुनी के प्रेम की पराकाष्ठा की अनुभूति होती है।

गहलौर की घाटी बहुत ही सुंदर है। ऊंची-ऊंची कई पहाड़ियां है। अलग-अलग किस्म के पेड़ लगे हुए है। ताड़ के पेड़ और घाटी में बढ़िया सड़क है। पिछड़ा इलाके होने के बाद भी गहलौर में बिजली, पेयजल, अस्पताल और स्कूल है। गया और राजगीर जाने वाले पर्यटक कुछ देर के लिए घाटी में ज़रुर रुक जाते हैं। मांझी ने अपने नाम से दशरथ नगर बसाया है।

साल 2007 में आज के ही दिन यानि 17 अगस्त को गॉल ब्लॉडर के कैंसर से जूझते हुए दशरथ मांझी ने भी 73 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया लेकिन उनकी कहानी पत्थर पर लिखा इतिहास है जिसे बार बार दोहराया जाता रहेगा।

दशरथ मांझी 1972 में पैदल ही रेलवे ट्रैक के किनारे-किनारे दो महीने में दिल्ली पहुंच गये थे। बिहार के नेता रामसुंदर दास से मुलाकात की थी और पीएम से भी मिलने गए थे, लेकिन सुरक्षाकर्मियों ने मिलने से रोक दिया था।

2015 में फिल्म निर्देशक केतन मेहता ने मांझी द माउंटेन मैन के नाम से दशरथ मांझी के जीवन पर फिल्म बनाई थी। किरदार में नवाजुद्दीन सिद्दकी और दशरथ मांझी के पत्नी फगुनी की भूमिका राधिका आप्टे ने निभाई थी। इस फिल्म की शूटिंग 85 फीसदी गहलौर घाटी में हुई थी।