यक्षिणी की मूर्ति के सम्मान में 18 अक्टूबर को मनेगा बिहार कला दिवस

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पटना: विश्वविख्यात यक्षिणी की मूर्ति के साथ एक और सम्मान जुड़ गया है। बिहार सरकार ने चामर ग्राहिणी यक्षिणी के सम्मान में यक्षिणी की प्राप्ति तिथि 18 अक्टूबर को हर साल ‘बिहार कला दिवस’ के रूप में मनाने का फैसला किया है।

इस संबंध में अधिसूचना जारी कर दी गई है। 18 अक्टूबर को भव्य आयोजन किए जाएंगे।

दीदारगंज में मिली थी मूर्ति

पटना के दीदारगंज में गंगा तट पर 18 अक्टूबर 1917 को चामर ग्राहिणी यक्षिणी की अद्भुत मूर्ति मिली थी। इस साल 18 अक्टूबर को यक्षिणी प्राप्ति के 100 वर्ष पूरे हो जाएंगे।

एक साल तक मनेगा बिहार कला वर्ष

सचिव चंचल कुमार ने कहा कि 18 अक्टूबर 2016 से 18 अक्टूबर 2017 को ‘बिहार कला वर्ष’ के रूप में मनाया जाएगा। 18 अक्टूबर को नवनिर्मित बिहार संग्रहालय संपूर्ण रूप से जनता के लिए खोल दिया जाएगा। इसी दिन समारोहपूर्वक पटना संग्रहालय से यक्षिणी की मूर्ति बिहार संग्रहालय में स्थापित की जाएगी।

बिहार कला पुरस्कार का होगा वितरण

18 अक्टूबर को ‘बिहार कला पुरस्कार’ वितरण शुरू करने और पुरस्कार में यक्षिणी की मूर्ति देने का भी निर्देश दिया गया है।

केन्द्र से राष्ट्रीय कला दिवस मनाने का होगा आग्रह

राज्य सरकार ने निर्णय किया है कि वह केन्द्र सरकार को प्रस्ताव भेजेगा कि चामर ग्राहिणी यक्षिणी प्राप्ति की तिथि 18 अक्टूबर को ‘राष्ट्रीय कला दिवस’ के रूप में मनाया जाए। सरकार ने यह भी निर्णय लिया है कि इस मौके पर चामर ग्राहिणी यक्षिणी के चित्र से युक्त डाकटिकट एवं स्मारक सिक्का जारी करने का अनुरोध केंद्र से किया जाएगा।

समारोह की तैयारी हुई तेज

मुख्यमंत्री सचिवालय से निर्देश मिलने के बाद कला संस्कृति विभाग ने 18 अक्टूबर को बिहार कला दिवस के रूप में मनाने की तैयारी शुरू कर दी है। हर मंगलवार को विभाग के प्रधान सचिव चैतन्य प्रसाद की अध्यक्षता में इसके लिए बैठक हो रही है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों को अंतिम रूप देने के लिए ललित कला और संगीत नाटक अकादमी से प्रस्ताव मांगे गए हैं।

कैसी है दीदारगंजी से मिली यक्षिणी की मूर्ति

ऊंचाई-5 फीट 2 इंच

किस पत्थर से बनी- बलुआ पत्थर

जिस चौकी पर बैठी-1 फीट 7.5 इंच

पॉलिश-चमकदार

खोज-1917 (इसी साल पटना संग्रहालय की स्थापना हुई थी)

खोज का श्रेय-गुलाम रसूल नामक व्यक्ति को (पटना के तत्कालीन कमिश्नर एचएस. वाल्स के पत्र में जिक्र)

किस हालत में मिली थी मूर्ति- दीदारगंज के नज़दीक गंगा नदी तट पर कीचड़ में मिली थी

स्त्री सौंदर्य का कराती है दर्शन

यक्षिणी की मूर्ति प्राचीन भारत के स्त्री सौंदर्य के आदर्श मानकों को प्रतिबिंबित करती है। उसकी आकृति पूर्ण वक्षप्रतिमा, पतली कमर तथा व्यापक नितंब के साथ कामुक है। ग्रीवा त्रिवाली-कमर पर बलन के रूप में सुंदरता।

होठों की मुस्कान पकड़ में नहीं आनेवाली

यक्षिणी विनम्रता की मांग करती हुई सीधे खड़े होने के बजाय आगे की ओर थोड़ी झुकी हुई है। उसके होठों की मुस्कान पकड़ में नहीं आती। फिर भी बेहद प्यारी मुस्कुराहट है।

दाहिने पैर का डिजाइन थोड़ा झुका हुआ

उसके दाहिने पैर का डिजाइन थोड़ा झुका हुआ है, मानो ऐसा उसके हाथ से पकड़ी गई हल्की सी कूची तथा चौरी पर उसकी पकड़ की दृढ़ता के कारण हो। यह एक गोल आकृति वाली मूर्ति है, जिसका मतलब है कि इसे किसी भी कोण से देखा-निहारा जा सकता है।

बायीं बांह नहीं, फिर भी रोमांच पैदा करनेवाली

यक्षिणी मूर्ति की बायीं बांह नहीं है तथा इसकी नाक खपची है। इस टूट-फूट के बावजूद लंबे समय के गुज़र जाने के बाद भी यह मूर्ति रोमांच और जादू पैदा करती है तथा यह मूर्ति इस बात की आकर्षक उदाहरण है कि हज़ारों साल पहले बिहार की शिल्पकला कितनी उन्नत थी।

मौर्य काल में बनी थी मूर्ति

यक्षिणी की मूर्ति किस काल में बनी, इस पर विवाद है। लेकिन जैसा शिल्प और जैसी पॉलिस इस मूर्ति पर की गयी है, उससे लगता है कि यह मौर्य काल में बनायी गयी होगी।

साभार : हिन्दुस्तान