यह बूढ़ा बाप रोटियों के लिए छह किलोमीटर का लंबा सफर करता है तय

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जहानाबाद: बिहार के जहानाबाद जिले के चातर गांव के रहने वाले वसंत शर्मा एक रोटी की खातिर हर रोज छह किलोमीटर साइकिल चलाकर गांव से शहर का सफर पूरा करता है। रोज शहर के ढाई सौ घरों का चक्कर लगाने के बाद यह बूढ़ा आदमी रोटी लेकर गरीबों और बेसहारा बच्चों में बांट देता है। इसके बदले में उसे सिर्फ लोगों की दुआएं मिलती है।

वसंत शर्मा नाम का यह शख्स हर रोज यह रोटी अपने या अपने बच्चों के लिए नहीं, बल्कि दूसरों का पेट पालने के लिए इक्ट्ठा करता है। इसके लिए वे रोज अपने गांव चातर से साइकिल की सवारी कर जहानाबाद शहर आते हैं।शहर से उनके गांव की दूरी छह किलोमीटर है।

बरसात हो या शीतलहर या फिर चमड़ी को जला देनेवाली लू चलती हो किसी भी मौसम की फिक्र किए बिना वे हर रोज दोपहर में असहायों का पेट पालने के लिए अपने घर से निकल पड़ते हैं। वे यह सब इसलिए करते हैं कि बीमार बेटे को गरीबों-असहायों की दुआ मिल जाए।

उनका बड़ा बेटा 28 वर्षीय आजाद कुमार डेढ़ साल से बेड पर पड़ा है। उसी की सलामती के लिए वे गरीबों की सेवा में जुटे हैं। वसंत बाबू को कितनी भी तकलीफ क्यों न आ जाए, वे असहायों का पेट पालने का काम एक दिन भी नहीं छोड़ते। उन्होंने बताया कि रोज वे खुद रोटी बांटते हैं। लेकिन, रविवार को डॉक्टर, समाजसेवी, शिक्षक, वकील, इंजीनियर के हाथों बंटवाते हैं। इसमें किसी राजनीतिक व्यक्ति का साथ नहीं लिया जाता है।

वसंत शर्मा ने बताया कि काको प्रखंड के उनके गांव चातर में एक साल पहले आठ-दस युवक आए थे। वे किसी वैसे व्यक्ति की तलाश कर रहे थे, जो रोजाना गांव से शहर जाए और वहां के ढाई सौ घरों से एक-एक रोटी लेकर सदर अस्पताल व स्टेशन पर असहायों को खिलाए।

उनकी यह बात वसंत बाबू के कानों तक पहुंची। वे उक्त युवाओं के पास गए और बोले कि क्या यह काम मैं नहीं कर सकता? युवाओं ने उनकी उम्र देखकर कहा बाबा आपसे नहीं हो सकेगा। उन्होंने कहा कि प्रयास करके देखने में क्या है? युवक राजी (तैयार) हो गए। जब उन्हें उनका काम पसंद आया, तो युवकों ने वसंत शर्मा को मजदूरी देने की पेशकश की। लेकिन, उन्होंने कहा कि वे मजदूरी नहीं लेंगे, खाट पर पड़े अपने बेटे की सलामती की दुआ लेकर असहायों की सेवा करेंगे। तब से वे यह काम करते आ रहे हैं।

मालूम हो कि अमन दीप नामक युवक के नेतृत्व में दस युवकों ने ‘एक रोटी नामक संस्था बनाई है। यह संस्था 25 दिसंबर 2015 को बनी थी। संस्था के लोग किसी से चंदा नहीं लेते। इन युवाओं ने शहर के ढाई सौ घरों में टिफिन (लांच बॉक्स) उपलब्ध कराया है। इसी टिफिन में गृहिणियां समय पर रोटी व सूखी सब्जी डाल अपने दरवाजे के पास रख देती हैं।

वसंत बाबू साइकिल की घंटी घनघनाते हुए उनके दरवाजे तक जाते हैं और टिफिन में रखी रोटी व सब्जी निकालकर बड़े कैसरोल में रखते जाते हैं। वे यह काम शाम पांच बजे तक करते हैं और छह बजे तक रोटी-सब्जी बांटने के बाद अपने गांव लौट जाते हैं। पूछने पर उन्होंने कहा कि संस्था का उद्देश्य मानव तस्करी को रोकना है। इसी कारण तो स्टेशन पर भी एनाउंस कराते हैं कि भिखारियों को कुछ देना ही है, तो भोजन दीजिए पैसे नहीं।
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वसंत बाबू ने बताया कि उनके पास दो भैंस और पांच बीघा जमीन है। इसी की कमाई से वे परिजनों की परवरिश करते हैं। कुर्था के पास सड़क दुर्घटना में बेटा आजाद गंभीर रूप से घायल हो गया। वह छह माह तक कोमा में रहा। उसकी इलाज में सारी जमापूंजी खत्म हो गई। वे गरीबों की सेवा करते हैं और उनके बेटे परिवार चलाने के लिए खेतीबारी व दूध बिक्री का काम करते हैं।

श्रोत: जागरण