ये रिश्ता क्या कहलाता है?

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बिहार सीएम ने नोटबन्दी की तारीफ की और समर्थन किया तो पीएम मोदी ने रिटर्न गिफ्ट में शराबबन्दी की तारीफ़ कर दी। मौका तो था 350वें गुरुपर्व का पर राजनीतिक तीर की जगह एक-दूसरे की तारीफ़ में कसीदे पढ़ दिए। नीतीश ने मंच से शराबबन्दी को लेकर बिहार में हो रही पहल के बारे में सिख श्रद्धालुओं को समझाया। तो पीएम मोदी ने नीतीश के शराबबन्दी को ना सिर्फ सराहा बल्कि तहे दिल से साथ देने का वादा भी किया। साथ ही गुरुपर्व के शानदार आयोजन पर बधाई भी दी यानी गिफ्ट के बदले रिटर्न गिफ्ट्।

कौन नहीं जानता है कि एक वक्त था जब नरेन्द्र मोदी को नीतीश कुमार ने बिहार में चुनाव प्रचार करने से रोक दिया था। ये सबको मालूम है कि नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी पर नीतीश ने बीजेपी से 17 साल पुराना रिश्ता तोड़ लिया।

एक वो भी वक्त था जब नीतीश नरेन्द्र मोदी का नाम तक लेने से कतराते थे पर राजनीति की यही तो तासीर है कि न कोई यहां दुश्मन है और ना कोई दोस्त्। सब वक्त के साथ बदलता रहता है। मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद अपने पिछले दो दौरों में, नीतीश का नाम महज औपचारिकतावश ही लिया था। पर आज बार-बार नीतीश का नाम लेते वे थक नहीं रहे थे। दोनों के बीच में क्या सच में कोई खिचड़ी पक रही है या फिर दोस्ती की आड़ में नए तरीके से दुश्मनी की नींव पड़ रही है? अमूमन नेता अपने विरोधियों पर बरसने का कोई मौका नहीं छोड़ते लेकिन शायद देश की राजनीति में यह पहला मौका होगा जब विरोध में चीनी के चाशनी से भीगोकर तीर चलाए जा रहे हैं? आखिर नीतीश ने मोदी के उन कदमों की तारीफ क्यूं की ?

  • नीतीश इस बात को अच्छे तरीके से जान गए हैं कि भले ही मोदी के नीतियों का वो विरोध करें पर हर विरोध को बीजेपी हिन्दू-मुस्लिम के चश्मे से देखने और दिखाने की कोशिश करती है। ऐसे में बहुसंख्यक नीतीश को अपना विरोधी ना माने इसलिए तलवार की धार पर चलते हैं।
  • राजनीति की एक ये भी शगल है कि पहले उन मुद्दों पर अपने विरोधी का साथ दो जिसे आम जनता अपने हक में मानती हो और उस वक्त का इंतजार करो जब जनता का मोह भंग होने लगे तब वार करो
  • कन्फ्यूशन मॉडल – नीतीश लालू के साथ मोदी के विरोध में गए। पर लालू इसकी कीमत ना वसूल सके इसलिए ऐसा कन्फ्यूशन पैदा कर दो कि विरोधी और दोस्त दोनों ही इस बात से परेशान हो जाएं कि आखिर वो चाहते क्या हैं और जब मौका मिले तो किसी एक का कन्फ्यूशन दूर कर दें।
  • बिहार में कई ऐसी परियोजनाएं हैं जिसके लिए केन्द्र से मदद चाहिए। केन्द्र के साथ अच्छे रिश्ते से राज्य को मदद मिल सकती है।
  • देश में ऐसे नेता की छवि बनाना जिसमें जाति, धर्म से उपर उठकर एक चेहरा बन सके।

 

मोदी ने नीतीश की क्यूं तारीफ की ?

1) नीतीश के नोटबन्दी के समर्थन का एलान नरेन्द्र मोदी के किसी सौगात से कम नहीं था। ऐसे में शराबबन्दी की तारीफ कर नीतीश को रिटर्न गिफ्ट दे दिया।

2) मोदी जानते हैं कि विपक्ष में नीतीश ही एक ऐसा चेहरा हैं जो उनको माकूल जवाब दे सकते हैं और ऐसा बिहार विधान सभा के चुनाव के दौरान करके दिखाया भी था। तो नीतीश का हाथ पकड़ने में कोई बुराई नहीं है।

3) मौका गुरुपर्व का था, ऐसे में कोई राजनीतिक मैल छुड़ाने से उनकी ही गरिमा को ठेस पहुंचती।

कुल मिलाकर इस मेल-मिलाप का कोई राजनीतिक महत्व नहीं है। पर अपनी छवि सुधारने के लिए इन नेताओं की ये कोशिश रंग लाई तभी तो लालू यादव ने ना नीतीश, ना ही मोदी पर कोई तंज कसा बल्कि साथ में लंगर में लुत्फ़ उठाया।

पीएम मोदी के कार्यक्रम के दौरान कौन नेता क्या कर रहे थे ?

1) लालू यादव ढाई घंटे तक पहली बार जमीन पर बैठे। इस बार उन्हें मंच पर नहीं बल्कि वीवीआईपी गैलरी में बैठना पड़ा। साथ में उनके दोनों मंत्री बेटे भी बैठे रहे। लालू के आने पर पंडाल में बैठे पंजाबियों में उनसे हाथ मिलाने की होड़ लग गई।

2। शत्रुघ्न सिन्हा आंख पर चश्मा डाले पंडाल में पहुंचे तो उन्हें पहले लोगों ने नहीं पहचाना, बाद में उन्हें देखकर काफी खुश हुए। पर उन्हें वीवीआईपी गैलरी में ही बैठना पड़ा।

3। सबसे बुरा हाल सुशील मोदी का हुआ। उन्हें लालू के स्टाफ असगर के बगल में जगह मिली।

4। पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी सुशील मोदी के बगल में बैठे रहे।

5। विपक्ष के नेता प्रेम कुमार, केन्द्रीय मंत्री राम कृपाल यादव, पंजाब के उप मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल भी वीवीआईपी गैलरी में ही थे।

जब कार्यक्रम खत्म हुआ तो बारी थी लंगर में खाने की। अलग से बनाए गए पंडाल में बीजेपी के बिहार के किसी नेता को जगह नहीं मिली। यहां तक कि विपक्ष के नेता प्रेम कुमार भी बाहर ही टहलते रहे।