‘रामफल का गाँव’…और गाँव का रामफल !

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धरहरा, आरा, बिहार।

बस इतना सा पता था सुप्रसिद्ध साहित्यकार स्व.मधुकर सिंह का और तीन शब्दों के इसी पते ने हिंदी साहित्य की तमाम पत्र-पत्रिकाओं में ऐसी धूम मचाई कि प्रत्येक सुधि लेखक-पाठक-संपादक को ये पता कंठस्थ हो गया। ये पता था मधुकर सिंह के गाँव का। रचनात्मक शख्सियत ऐसी कि हिंदी और हिंदुस्तान ही नहीं विदेशी भाषाओँ और दुनिया भर में पढ़े-जाने गए मधुकर जी।

गाँव उनकी रूह में बसता था और गरीब उनके रचनाई चौरा पर। शायद यही वजह थी कि बहुत बीमार हाल में जब ग़ुरबत झेल रहे मधुकर जी को तत्कालीन नीतीश सरकार से कह सुन कर पटना के एक बड़े अस्पताल में भर्ती कराया गया तो वे एक रात अस्पताल से भाग कर अपने गाँव ‘धरहरा’ चले आये।

‘रामफल का गाँव’ लिखने वाले ने गाँव में ही अपनी अंतिम साँस ली। एक छोटे शहर आरा से उन्होंने साहित्य और लेखकों के कई आंदोलनों को राष्ट्रीय स्तर पर जीया। सही मायने मे गंवई कथाकार थे मधुकर सिंह !

नवेन्दु कुमार के फेसबुक वाल से https://www.facebook.com/navendu.kumarsinha